आज अपने मध्य प्रदेश का जन्मदिन है। 70 साल का हो गया है अपना एमपी। इन सात दशकों में प्रदेश ने बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ बदला, लेकिन यहां के अजूबे आज भी बरकरार हैं। तो मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस पर आइए, आपको दिखाते हैं अपने एमपी के कुछ ऐसे ही गजब रंग, जिन्हें देखकर आप भी कहेंगे... एमपी अजब है, सबसे गजब है।
यहां मिलेगा ‘चने का झाड़’
चने के झाड़ पर चढ़ाना... ये मुहावरा आपने कई बार सुना होगा। लेकिन कोई आपसे कहे कि आप चने के झाड़ पर चढ़ भी सकते हैं, तो हैरान मत होइएगा। क्योंकि मध्य प्रदेश में ऐसा हकीकत में हो सकता है। यहां चने का एक विशाल पेड़ मौजूद है।
ये अजूबा उज्जैन से करीब 70 किलोमीटर दूर भाटपचलाना गांव में देखने को मिलता है। यह गांव अपने विशाल और अनोखे चने के पेड़ के लिए प्रसिद्ध है। इसी वजह से इसे 'चने के झाड़ वाला गांव' भी कहा जाता है।
बताया जाता है कि चने का यह पेड़ करीब 600 साल पुराना है। इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं।
है तो आम, लेकिन खास है
ये है तो आम, लेकिन आम नहीं... खास है। रसीला और मीठा, नाम भी उतना ही खास... नूरजहां। फलों के राजा आम की यह खास किस्म मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले में पाई जाती है।
जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर कट्ठीवाड़ा में पैदा होने वाला यह जंबो साइज आम अपने वजन के लिए मशहूर है। इसका एक आम 5 किलो तक का होता है।
यानी एक ही आम पूरे परिवार के लिए काफी है। इसे देखकर कह सकते हैं कि आम नहीं, पूरा फैमिली पैक है।
कट्ठीवाड़ा को यहां का चेरापूंजी भी कहा जाता है। इसकी वजह है जिले में सबसे ज्यादा बारिश का यहीं होना। यही खास जलवायु नूरजहां आम को भी खास बनाती है।
ये जगह है अजगरों का स्वर्ग
मध्य प्रदेश में एक ऐसी जगह भी है, जहां इंसानों से ज्यादा अजगरों का बसेरा है। यह है मंडला का अजगर दादर गांव, जो जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है।
गहरी दरारों वाला यह पथरीला इलाका नीचे से खोखला है। यहां चूहों की भी भरमार है। यही वजह है कि यह जगह अजगरों के लिए मुफीद ठिकाना बन गई है।
सर्दियों के मौसम में यहां का नजारा और भी अनोखा हो जाता है। अजगरों के झुंड चट्टानों से निकलकर धूप सेंकते नजर आते हैं। एक ही जगह पर इतने सारे अजगरों को देखना किसी अजूबे से कम नहीं है।
यहां संस्कृत रोजमर्रा की भाषा
आमतौर पर लोगों की जुबान पर हिंदी, अंग्रेजी या कोई स्थानीय बोली रहती है। लेकिन मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में एक ऐसा गांव है, जहां संस्कृत आम बोलचाल की भाषा है।
जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित झिरी गांव की आबादी लगभग 1500 है। यहां बच्चों, युवाओं और महिलाओं से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई देवभाषा संस्कृत में बातचीत करता है।
इतना ही नहीं, गांव के स्कूल में भी संस्कृत को प्राथमिक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है।
बताया जाता है कि संस्कृति और संस्कृत को बचाने के उद्देश्य से करीब 23 साल पहले इसकी शुरुआत की गई थी। तब से यह गांव संस्कृत को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाए हुए है।
नदियों का मायका है मध्य प्रदेश
आमतौर पर भारत की ज्यादातर नदियों का उद्गम हिमालय से होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश को नदियों का मायका भी कहा जाता है। इसकी वजह है यहां से निकलने वाली कई प्रमुख नदियां।
नर्मदा, चंबल, शिप्रा और ताप्ती समेत कई नदियों का उद्गम मध्य प्रदेश में ही हुआ है। इनमें पुण्य सलिला मां नर्मदा की महिमा सबसे निराली है।
खास बात यह है कि जहां देश की ज्यादातर प्रमुख नदियां पूर्व दिशा में बहते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं, वहीं नर्मदा अपनी अलग राह चुनती है। यह पश्चिम दिशा में बहते हुए अरब सागर में समा जाती है। यही खासियत नर्मदा को देश की दूसरी नदियों से अलग पहचान देती है।
यहां पत्थरों से निकलता है संगीत
मध्य प्रदेश संगीत सम्राट तानसेन की धरती है। यहां संगीत की एक ऐसी अनोखी दुनिया भी है, जहां पत्थरों को बजाने पर मधुर स्वर गूंजते हैं। यह अजूबा देवास की कावड़िया हिल्स पर देखने को मिलता है।
उदयनगर फॉरेस्ट रेंज में आने वाले इस इलाके में करीब 7 पहाड़ियां हैं, जो लगभग 5 किलोमीटर के दायरे में फैली हैं। इन पहाड़ियों पर लाखों खंभेनुमा पत्थर बिखरे हुए हैं। खास बात यह है कि ये पत्थर षटकोण, पंचकोण, चतुष्कोण और त्रिभुज जैसी अलग-अलग आकृतियों में हैं।
इन काले पत्थरों को किसी छोटे पत्थर या धातु से बजाने पर वाद्य यंत्रों जैसी मधुर और संगीतमय आवाज निकलती है। इनकी खास बनावट देखकर ऐसा लगता है, मानो किसी कारीगर ने इन्हें तराशा हो। लेकिन यह किसी इंसान की कारीगरी नहीं, बल्कि प्रकृति का अनोखा हुनर है, जो पत्थरों में भी संगीत पैदा करता है।
एमपी का काला ताजमहल देखा क्या
ताजमहल का नाम आते ही सफेद संगमरमर से बनी खूबसूरत इमारत की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। लेकिन मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में एक ऐसा मकबरा है, जो सफेद नहीं, बल्कि काले रंग की वजह से मशहूर है।
यह है शाह नवाज खां का मकबरा, जिसे 'काला ताजमहल' कहा जाता है। खास बात यह है कि इसका निर्माण आगरा के ताजमहल से भी पहले हुआ था।
उतावली नदी के किनारे बने इस मकबरे के बाहरी हिस्से में काले पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। अपनी अनूठी बनावट और काले रंग की वजह से यह मकबरा लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
अनोखी धरोहर चौसठ योगिनी मंदिर
मध्य प्रदेश की पहचान सिर्फ प्राकृतिक अजूबे ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक इमारतें भी हैं। ऐसी ही एक अनोखी धरोहर मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित चौसठ योगिनी मंदिर है।
गोल आकार का विशाल गलियारा, उसमें बने 64 छोटे-छोटे कमरे और बीच में भव्य मंडप... मंदिर की बनावट इसे खास बनाती है। यह मंदिर चौसठ योगिनियों यानी दिव्य शक्तियों को समर्पित है।
इसकी वास्तुकला को लेकर एक दावा यह भी किया जाता है कि देश का पुराना संसद भवन इसी मंदिर की डिजाइन से प्रेरित होकर बनाया गया था। यही वजह है कि यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ अपनी अनूठी स्थापत्य कला के लिए भी मशहूर है।