फिल्म: 'रामायण पार्ट 1'
रेटिंग:3.5 / 5
ड्यूरेशन: 3 घंटे 15 मिनट
एक तरफ अयोध्या के राजकुमार राम, जिनके लिए मर्यादा सबसे बड़ा धर्म है। दूसरी तरफ लंका का राजा रावण, जिसके पास ज्ञान भी है, शक्ति भी और तीनों लोकों पर राज करने का अहंकार भी। इन दोनों के आमने-सामने आने से पहले की कहानी को करीब 4000 करोड़ रुपए के विशाल सिनेमाई कैनवास पर उतारना आसान काम नहीं है।
खासकर तब, जब कहानी सिर्फ मनोरंजन नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था से भी जुड़ी हो। नितेश तिवारी की 'रामायण पार्ट वन' इसी जिम्मेदारी के साथ पर्दे पर आती है। रणबीर कपूर राम के रूप में गंभीर और गरिमामय नजर आते हैं, तो यश का रावण अवतार अपने रौब से अलग पहचान बनाता है।
फिल्म में अयोध्या की भव्यता है, लंका का वैभव है और एक ऐसे युद्ध की तैयारी है, जिसका इंतजार हर दर्शक को है। लेकिन इस महागाथा का पहला अध्याय आखिर कितना असर छोड़ता है? इसकी कहानी में आगे बढ़ते हैं।
कहानी: रावण के दस सिरों से शुरू होती है सत्ता और अहंकार की दास्तान
दिलचस्प बात यह है कि फिल्म की शुरुआत राम से नहीं, बल्कि रावण से होती है। कहानी पहले लंका के उस राजा की दुनिया में ले जाती है, जिसके पास अपार शक्ति है, ज्ञान है और अपनी तपस्या से हासिल किए गए वरदानों का घमंड भी।
रावण (यश) कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करता है और वरदान हासिल करता है। इसके बाद उसकी महत्वाकांक्षा बढ़ती जाती है। वह इंद्र को पराजित करता है और अपने सौतेले भाई कुबेर से लंका का अधिकार हासिल कर लेता है। फिल्म रावण के उदय के साथ उसके व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाती है।
रावण को दशानन क्यों कहा जाता है और उसके दस सिरों की पौराणिक पहचान क्या है, इस पहलू को भी कहानी में जगह मिलती है। यहां रावण सिर्फ एक शक्तिशाली राजा नहीं, बल्कि ज्ञान, तपस्या और अहंकार का ऐसा संगम है, जिसकी महत्वाकांक्षा की कोई सीमा नहीं।
इसके बाद कहानी अयोध्या की ओर मुड़ती है। भगवान विष्णु के अवतार राम (रणबीर कपूर) का जन्म राजा दशरथ के घर होता है। उनका बचपन, ऋषि विश्वामित्र के साथ यात्रा, मिथिला में सीता (साई पल्लवी) के स्वयंवर में शिव धनुष तोड़ना और विवाह जैसे प्रसंग दिखाए जाते हैं।
सब कुछ ठीक चल रहा होता है, लेकिन राजमहल की राजनीति कहानी की दिशा बदल देती है। कैकेयी (लारा दत्ता) अपने दो वरदान मांगती हैं और राम को चौदह वर्षों का वनवास मिलता है। राम के साथ सीता और लक्ष्मण (रवि दुबे) भी वन की ओर निकल पड़ते हैं।
वनवास के दौरान शूर्पणखा (रकुल प्रीत सिंह) का प्रसंग आता है। इसके बाद मारीच का स्वर्ण मृग वाला मायाजाल कहानी को उस मोड़ पर ले जाता है, जहां राम और लक्ष्मण आश्रम से दूर चले जाते हैं। साधु के वेश में पहुंचा रावण सीता का हरण कर लेता है।
सीता को बचाने के लिए जटायु रावण से युद्ध करता है। घायल जटायु राम को सीता के अपहरण की जानकारी देता है और अंतिम सांस लेता है। यहीं फिल्म का पहला भाग एक बड़े भावनात्मक मोड़ पर पहुंचता है।
फिल्म का पोस्ट क्रेडिट सीन भी खास है। इसमें हनुमान जी (सनी देओल) की झलक दिखाई जाती है। उन्हें पीछे और साइड से उड़ते हुए दिखाया गया है। इस दौरान 'जय श्री राम' का उद्घोष सुनाई देता है, लेकिन उनका चेहरा नहीं दिखाया जाता। यह छोटा सा सीन आगे आने वाली कहानी की एक झलक देता है।
पहले भाग में रावण का उदय, राम का वनवास और सीता हरण तक की कहानी दिखाई गई है। अब हनुमान जी की लंका यात्रा, अशोक वाटिका, रामसेतु और लंका युद्ध जैसे बड़े प्रसंगों के लिए दूसरे भाग का इंतजार करना होगा।
एक्टिंग: रणबीर की गंभीरता और यश का रौद्र अवतार
भगवान राम का किरदार निभाना किसी भी अभिनेता के लिए बड़ी जिम्मेदारी है। रणबीर कपूर इस भूमिका में संयम और गंभीरता लेकर आते हैं। उनके चेहरे पर शालीनता और व्यवहार में मर्यादा दिखाई देती है। वह राम को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने के बजाय सहज और गरिमामय रखने की कोशिश करते हैं।
साई पल्लवी (सीता) अपनी स्वाभाविक अदाकारी और भावपूर्ण अभिव्यक्ति से किरदार में सहजता लाती हैं। रवि दुबे (लक्ष्मण) के अभिनय में भाई के प्रति समर्पण और रक्षक का भाव दिखाई देता है।
यश (रावण) की बात करें तो उनका अंदाज अलग ही है। रौबदार व्यक्तित्व, दमदार आवाज, आंखों में अहंकार और पर्दे पर उनकी मौजूदगी रावण के किरदार को प्रभावशाली बनाती है। उनकी एंट्री और बड़े दृश्यों में उनका अंदाज खास ध्यान खींचता है। वह रावण के राजसी ठाठ, शक्ति और क्रोध को अपने अभिनय से सामने लाते हैं।
अरुण गोविल (दशरथ), लारा दत्ता (कैकेयी), शिबा चड्ढा (मंथरा) और रकुल प्रीत सिंह (शूर्पणखा) भी अपनी भूमिकाओं में नजर आते हैं। वहीं सनी देओल की हनुमान के रूप में झलक अगले भाग को लेकर उत्सुकता बढ़ाती है।
डायरेक्शन: नितेश तिवारी का सबसे बड़ा सिनेमाई इम्तिहान
'दंगल' और 'छिछोरे' जैसी फिल्मों से अपनी पहचान बनाने वाले नितेश तिवारी के लिए 'रामायण' बिल्कुल अलग तरह की चुनौती है। यहां कहानी के साथ करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है और दर्शकों की अपेक्षाएं भी बेहद बड़ी हैं।
फिल्म को रावण के उदय से शुरू करना निर्देशक का दिलचस्प फैसला है। इससे राम और रावण के संसार को अलग-अलग स्थापित करने का मौका मिलता है। अयोध्या से लेकर लंका तक का विस्तार और पौराणिक संसार को पर्दे पर रचने की कोशिश उनके बड़े विजन को दिखाती है।
हालांकि, कुछ जगहों पर कहानी की भावनाओं को और ठहराव दिया जा सकता था। कई संवाद ऐसे हैं, जहां किरदारों की विशालता के हिसाब से शब्दों में वैसा वजन महसूस नहीं होता। रामायण के किरदारों से निकलने वाले संवाद सिर्फ जानकारी नहीं देते, बल्कि याद भी रह जाते हैं। इस मामले में फिल्म कुछ और दमदार हो सकती थी।
स्क्रीनप्ले: पहला अध्याय, बड़ी कहानी की भूमिका
रामायण की घटनाएं दर्शकों को पहले से मालूम हैं, लेकिन उन्हें किस क्रम में और किस अंदाज में पेश किया जाता है, यही स्क्रीनप्ले की असली चुनौती है।
फिल्म रावण की पृष्ठभूमि से शुरुआत करके राम के जन्म, विवाह, वनवास और सीता हरण तक पहुंचती है। इस दौरान दोनों संसारों को जोड़ने की कोशिश की गई है। कहानी का दायरा पहले भाग में सीमित रखा गया है, ताकि आगे होने वाले संघर्ष के लिए जमीन तैयार हो सके।
3 घंटे 15 मिनट की लंबाई के बावजूद कुछ हिस्सों में कहानी की रफ्तार धीमी पड़ती है। कुछ घटनाओं को और कसावट के साथ पेश किया जा सकता था। फिल्म का अंत भी किसी पारंपरिक विजयी क्लाइमैक्स की तरह नहीं, बल्कि आगे की बड़ी लड़ाई की शुरुआत के संकेत के साथ होता है।
VFX और टेक्निकल पहलू: लंका की भव्यता से लेकर युद्ध के संसार तक
यहां फिल्म अपने सबसे मजबूत पक्ष पर नजर आती है। अयोध्या का राजसी वैभव, लंका का विशाल साम्राज्य, महल, प्राकृतिक दृश्य और पौराणिक संसार को जिस पैमाने पर तैयार किया गया है, वह प्रभावित करता है।
VFX का इस्तेमाल कई दृश्यों में शानदार है। फिल्म का विजुअल स्केल भारतीय सिनेमा की तकनीकी महत्वाकांक्षा को दिखाता है। प्रोडक्शन डिजाइन, कॉस्ट्यूम, सिनेमैटोग्राफी और एक्शन कोरियोग्राफी भी इस विशाल संसार को विश्वसनीय बनाने में योगदान देते हैं।
हालांकि, कुछ राक्षसों और मायावी प्राणियों को दिखाने वाले दृश्यों में VFX थोड़ा कमजोर पड़ता है। उनके लुक और मूवमेंट में कहीं-कहीं कृत्रिमता महसूस होती है। लेकिन यह कुछ हिस्सों तक सीमित है। ओवरऑल फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट शानदार है और बड़े पर्दे पर इसका अनुभव खास बनता है।
म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर: रहमान और जिमर से कुछ ऐसी धुन की उम्मीद थी जो याद रह जाए
ए.आर. रहमान और हंस जिमर जैसे दिग्गज संगीतकारों का एक साथ आना अपने आप में बड़ी खबर थी। ऐसे में उम्मीद थी कि रामायण को ऐसा संगीत मिलेगा, जो सिर्फ दृश्यों का साथ नहीं देगा, बल्कि खुद कहानी का हिस्सा बन जाएगा।
राम की एंट्री पर कोई ऐसी धुन सुनाई दे, जो उनके किरदार की गरिमा और दिव्यता का एहसास कराए। रावण के आते ही बैकग्राउंड में ऐसा संगीत बजे, जो उसके रौद्र व्यक्तित्व को और विशाल बना दे, लेकिन फिल्म में कोई ऐसा यादगार थीम म्यूजिक सुनाई नहीं देता, जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी जेहन में बना रहे।
कुछ दृश्यों में बैकग्राउंड स्कोर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है, लेकिन कुल मिलाकर संगीत वह जादू नहीं पैदा कर पाता जिसकी इस महागाथा से उम्मीद थी। इतने बड़े नामों के साथ यह उम्मीद करना गलत भी नहीं था कि फिल्म का संगीत भी इसके VFX जितना ही भव्य और यादगार होगा। इस मोर्चे पर थोड़ी निराशा हाथ लगती है।
फाइनल वर्डिक्ट: भव्यता का नया पैमाना, लेकिन हर जगह नहीं जगा पाई जादू
'रामायण पार्ट वन' भारतीय सिनेमा की एक बड़ी महत्वाकांक्षी कोशिश है। रणबीर कपूर राम के रूप में गंभीरता और मर्यादा लेकर आते हैं, जबकि यश अपने रावण अवतार से खास छाप छोड़ते हैं। शानदार VFX, विशाल प्रोडक्शन डिजाइन और पौराणिक संसार की भव्यता फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं।
कुछ हिस्सों में कहानी की धीमी रफ्तार, संवादों का अपेक्षित प्रभाव न छोड़ पाना और यादगार थीम म्यूजिक की कमी इसके अनुभव को थोड़ा कम जरूर करते हैं। राक्षसों के VFX में भी कुछ जगह सुधार की गुंजाइश है।
फिर भी फिल्म में बड़े पर्दे पर देखने लायक बहुत कुछ है। खासकर यश का रावण और फिल्म का विशाल विजुअल संसार। पहला अध्याय खत्म होते-होते दर्शकों के सामने सबसे बड़ा सवाल छोड़ जाता है कि अब राम और रावण के बीच होने वाला महायुद्ध पर्दे पर कितना विराट होगा।