रिज़र्वेशन हटाओ आंदोलन: क्या यह मुद्दा बीजेपी के गले की फाँस बन रहा है?
Updated on
30-08-2026 07:40 PM
हाल ही में दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में जहां बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की चर्चा के साथ ही जय भीम के नारों की गूंज रही.
उस आंदोलन के कुछ दिनों बाद ही उसी जंतर-मंतर पर आरक्षण के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए.
आरक्षण हटाओ आंदोलन के बैनर तले हो रहे इन प्रदर्शनों से आरक्षण की बहस एक बार फिर राजनीति के केंद्र में आ गई है.
लेकिन बीजेपी के लिए यह सिर्फ़ आरक्षण की नीति पर बहस नहीं है, यह उसके सामने खड़ी एक बड़ी राजनीतिक चुनौती है.
एक तरफ जनरल कैटेगरी के उस वर्ग की नाराज़गी है जो लंबे समय से उसके समर्थन का मूल आधार रहा है. दूसरी तरफ अन्य पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समुदाय हैं, जिनमें बीजेपी ने पिछले एक दशक में अपना सामाजिक आधार बढ़ाया है.
इनके बीच उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब कुछ ही महीने दूर है. ऐसे में सवाल यह भी है कि बीजेपी आरक्षण को लेकर उठ रही इन नई मांगों का जवाब कैसे देगी, वह भी बिना अपने एक समर्थक समूह को दूसरे से दूर किए हुए.
यही बीजेपी की असली राजनीतिक दुविधा है.
क्या बीजेपी अनारक्षित जातियों की चिंताओं को संबोधित करते हुए ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के बीच अपने समर्थन को बनाए रख पाएगी? या आरक्षण की बहस एक बार फिर उसके लिए वही मुश्किल राजनीतिक संतुलन पैदा करेगी, जिसमें एक समर्थन समूह को आश्वस्त करने की कोशिश दूसरे समूह में असुरक्षा पैदा कर सकती है.
'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इस पर तीन विषयों के विशेषज्ञों से चर्चा की. इस विषय के राजनीतिक पहलू पर बात की अमर उजाला से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु मिश्रा से.
दलितों के संदर्भ में आरक्षण पर जो सामाजिक बहस शुरू हुई है, उस पर बात की दलित विषयों पर लगातार लिखने वाली स्तंभकार तथा आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में असोसिएट प्रोफ़ेसर अदिति नारायणी पासवान से.
और आरक्षण हटाने की हालिया मुहिम के सामाजिक असर पर चर्चा की टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेस के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर बद्री नारायण से.
आंदोलन बीजेपी के ख़िलाफ़ है या आरक्षण के ख़िलाफ़?
जिस तरह से बीजेपी ने धीरे-धीरे अपना एक जातियों का बुके या गुलदस्ता बनाकर अपना आधार बढ़ाया है, यह उसके ख़िलाफ़ है या यह सिर्फ़ आरक्षण के ख़िलाफ़ आंदोलन है?
इस सवाल के जवाब में हिमांशु मिश्रा कहते हैं कि बीजेपी ने जातियों का एक बुके तैयार किया और यह सिलसिला 2014 में मोदी युग के साथ शुरू हुआ. उससे पहले बीजेपी को लोकसभा में 22% के आसपास वोट मिलते थे... वह सैंतीस फ़ीसदी तक पहुंच गए. बीजेपी अपने मूल वोटर, ऊंची जातियों, से आगे बढ़ी थी.
"बीजेपी के मूल वोट बैंक, सवर्णों, को लगता था कि उनकी हित रक्षक बीजेपी ही है. लेकिन बीजेपी ने जातियों का गुलदस्ता बना दिया तो इन्हें लगा कि बीजेपी इनसे पीछा छुड़ा रही है, इसलिए इसको सबक सिखाया जाना चाहिए."
वह कहते हैं कि मोदी युग शुरू होने के बाद से, इस आरक्षण विरोधी आंदोलन से पहली बार लग रहा है कि बीजेपी के मूल वोट बैंक में हलचल है और पार्टी को समझ नहीं आ रहा कि वह इस मामले में क्या करे.
इनकी (आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रतिनिधियों की) जेपी नड्डा से मुलाकात हुई है लेकिन दिक्कत यह है कि बीजेपी इनकी इस मांग का समर्थन नहीं कर सकती कि आरक्षण मेरिट के आधार पर हो. क्योंकि बीजेपी अगर ऐसा करेगी तो वह ओबीसी के वोट बैंक की कीमत पर करेगी.
हरियाणवी सिंगर और यूट्यूबर अंकित बालियान हत्याकांड को लेकर परिवार का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है. हत्या के 5 दिन बीत जाने के बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं…
अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने शुक्रवार को रक्षाबंधन का त्योहार मनाया. उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर इसकी जानकारी दी.उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर राखी बंधवाते…
मुकेश अंबानी की अगुवाई वाले रिलायंस ग्रुप ने शुक्रवार को मीडिया कारोबारी और एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा के आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए ख़ारिज कर दिया. चंद्रा ने…
दिल्ली और आसपास के शहरों में सीएनजी के दाम 3.89 रुपये प्रति किलो बढ़ गए हैं.इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (आईजीएल) ने शुक्रवार को इसकी जानकारी दी. नई क़ीमतें शनिवार सुबह 6…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 29 अगस्त से 1 सितंबर 2026 तक उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान के दौरे पर रहेंगे. वो शनिवार सुबह दिल्ली से उज्बेकिस्तान के लिए रवाना हुए.इस दौरान वह दोनों…
कांग्रेस नेता सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित संस्मरण किताब 'बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव' को लेकर प्रकाशन कंपनी पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने बयान जारी कर बताया है कि वो भारत…