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होर्मुज संकट के बीच भारत के साथ खड़ा हुआ चीन; चुपचाप हुआ खेल, देश के खजाने से दबाव भी हुआ कम!

Updated on 01-06-2026 01:39 PM
पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और होर्मुज संकट ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा पर करारा वार किया है. भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति किसी बड़े आर्थिक खतरे से कम नहीं थी, क्योंकि हम अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करते हैं. लेकिन इस मुश्किल दौर में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने भारत पर पड़ने वाले आर्थिक दबाव को काफी हद तक कम कर दिया. दिलचस्प बात यह है कि इसमें अहम भूमिका चीन ने निभाई. हालांकि उसकी नीयत कतई भारत की मदद की नहीं थी लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि चीन ने अपने फायदे के लिए जो कदम उठाया उसका परोक्ष तौर पर लाभ भारत को मिल गया.
दरअसल, दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक चीन इन दिनों सामान्य स्तर की तुलना में काफी कम मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है. इसका सीधा फायदा भारत समेत एशिया के कई देशों को मिला है. अगर चीन पहले की तरह बड़े पैमाने पर तेल खरीद रहा होता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें और अधिक बढ़ सकती थीं और भारत का आयात बिल कहीं ज्यादा भारी हो जाता.
आखिर होर्मुज संकट ने क्यों बढ़ाई दुनिया की चिंता?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है. वैश्विक स्तर पर समुद्री रास्ते से होने वाले करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की ढुलाई इसी रास्ते से होती है. भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और कई एशियाई देशों की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक इसी मार्ग पर निर्भर हैं. पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद इस मार्ग से तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई. नतीजतन बाजार में तेल की उपलब्धता घटने लगी और कीमतों में तेजी देखने को मिली. भारत के लिए यह विशेष रूप से चिंताजनक था क्योंकि युद्ध से पहले देश के कुल तेल आयात का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से आता था.
चीन ने अचानक क्यों घटा दी तेल खरीद?
ऊर्जा बाजार का अध्ययन करने वाली संस्था क्लेपर (Kpler) के आंकड़ों के मुताबिक मई महीने में चीन का कच्चे तेल का आयात घटकर लगभग 66 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जो 2016 के बाद का सबसे निचला स्तर है. इसकी कई वजहें हैं. पहली वजह यह है कि चीन के पास पहले से ही कच्चे तेल का विशाल भंडार मौजूद है. उसने वर्षों से रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तैयार किया हुआ है. ऐसे में आपूर्ति संकट के दौरान वह अपने स्टॉक का इस्तेमाल कर रहा है.
दूसरी वजह चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था है. पिछले कुछ समय से वहां आर्थिक गतिविधियों में अपेक्षित तेजी नहीं दिख रही है. औद्योगिक मांग कमजोर है और ईंधन की खपत भी पहले जैसी नहीं रही. इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ते रुझान ने भी तेल की मांग पर असर डाला है. यानी चीन फिलहाल बाजार से महंगे दाम पर तेल खरीदने की बजाय पुराने भंडार का इस्तेमाल कर रहा है.
भारत को कैसे मिला सीधा फायदा?
दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार चीन बाजार में खरीद नहीं कर रहा है. ऐसे में स्वाभाविक रूप से अन्य देशों के लिए सप्लाई की कमी नहीं रहती. यानी होर्मुज संकट के बावजूद बाजार में कच्चे तेल की कमी नहीं हुई और भारत जैसे देशों के लिए तेल खरीद में कोई दिक्कत नहीं आई. हालांकि, इस दौरान कीमतें जरूर बढ़ीं. लेकिन, इस स्थिति में डिमांड एंड सप्लाई का फॉर्मूला काम किया और कीमतें बेतहाशा नहीं बढ़ीं.
रूस, वेनेजुएला, पश्चिम अफ्रीका और अमेरिका के कुछ क्षेत्रों से आने वाले कच्चे तेल को सामान्य परिस्थितियों में चीन बड़ी मात्रा में खरीदता था. लेकिन, अब भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड और सिंगापुर जैसे देशों को ये तेल अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध हो रहा है. क्लेपर के अनुसार मई में भारत का तेल आयात लगभग 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो हाल के वर्षों के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है. इसमें रूस और वेनेजुएला से आयात की अहम भूमिका रही. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर चीन भी उसी समय बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा होता तो एशियाई देशों के लिए पर्याप्त सप्लाई उपलब्ध नहीं होती और कीतमें काफी बढ़ जातीं.
कितना बड़ा आर्थिक दबाव टला?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है. हर साल देश लगभग 180 से 200 करोड़ बैरल कच्चे तेल का आयात करता है. इसका अर्थ यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में केवल 1 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि भी भारत के वार्षिक आयात बिल में लगभग 2 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त बोझ डाल सकती है. यही कारण है कि तेल की कीमतों में मामूली उछाल का असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और सरकार की वित्तीय स्थिति पर पड़ता है. विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध के शुरुआती चरण में तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही थी. हालांकि चीन की कमजोर खरीदारी और विभिन्न देशों द्वारा अपने रणनीतिक भंडार से तेल जारी किए जाने के कारण कीमतें उस स्तर पर स्थायी रूप से नहीं पहुंच सकीं.

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