एसआईआर पर सवाल: क्या वोटर लिस्ट सुधारने की प्रक्रिया अब नागरिकता की जांच बन गई है?- द लेंस
Updated on
13-09-2026 12:43 PM
भारत में पिछले 70 वर्षों में कुल 53 लोगों को भारत रत्न से सम्मानित किया गया है और देश के जाने-माने वैज्ञानिक चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव यानी कि सीएनआर राव उनमें से एक हैं.
हम उनकी चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस हफ्ते की शुरुआत में 92 साल के राव को कर्नाटक में स्पेशल इन्टेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के तहत नाम में गड़बड़ी (सेल्फ़ नेम मिसमैच) को लेकर नोटिस दिया गया है.
इसके कारण एक बार फिर देश में जारी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं. बता दें कि देश भर में तकरीबन 13 करोड़ नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं.
ऐसा क्यों हो रहा है कि स्पेशल इन्टेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर ने बड़ी संख्या में लोगों के मताधिकार से वंचित होने की आशंका पैदा कर दी है और नागरिकता के कानूनी अर्थ को लेकर भी बहस छेड़ दी है. यह इसलिए भी है क्योंकि मतदाता सूची में वैसे तो हर साल संशोधन होता है.
बूथ लेवल ऑफ़िसर यानी बीएलओ होते हैं, राजनीतिक दलों के एजेंट होते हैं. नाम जोड़ने, हटाने और सुधार करने के लिए पूरी प्रक्रिया होती है. अगर यह पूरी व्यवस्था इतने सालों से काम कर रही थी तो अचानक ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली के तकरीबन एक तिहाई मतदाता ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट से बाहर हो गए या फिर महाराष्ट्र में एक ही बार में दो करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ़्ट सूची में नहीं रह गए.
सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि कितने नाम हटाए जा रहे हैं. सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या एसआईआर सिर्फ मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया है या फिर यह तय करने की प्रक्रिया बन रही है कि चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार किन लोगों के पास रहेगा.
अगर किसी नागरिक का नाम गलती से अंतिम मतदाता सूची से बाहर रह जाता है तो उसके पास क्या कानूनी और प्रशासनिक रास्ते होंगे. क्या इस पूरी प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता और जवाबदेही है?
इन सवालों के जवाब के लिए बीबीसी हिन्दी के ख़ास कार्यक्रम 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने बात की एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाली अंजलि भारद्वाज और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा से. अंजलि पारदर्शिता और जवाबदेही के मुद्दों पर काम करती हैं और वह पीपुल्स राइट टू इन्फ़ॉर्मेशन के राष्ट्रीय अभियान की सह-संयोजक हैं.
इस संदर्भ में पहला सवाल एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर है. क्या दिक्कत मतदाता सूची या निर्वाचक नामावली के संशोधन में है, या फिर मौजूदा चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया को लेकर समस्या है?
इस सवाल के जवाब में अंजलि कहती हैं कि स्पेशल इन्टेंसिव रिवीजन का प्रावधान संविधान में है लेकिन यह किसी किसी ख़ास निर्वाचन क्षेत्र या उनके किसी ख़ास हिस्से में ही किया जाना चाहिए. अब चुनाव आयोग ने अचानक तय कर लिया कि हम पूरे देश में एसआईआर करेंगे.
वह कहती हैं, "जब 100 करोड़ लोगों को शामिल कर कोई काम किया जा रहा है तो ज़रूरी था कि पहले लोगों और राजनीतिक दलों से बात की जाती. लेकिन चुनाव आयोग ने ऐसा नहीं किया. पहले के चुनाव आयोग खुद ऐसा करते रहे हैं. हमारे देश में इतने सारे पूर्व चुनाव आयुक्त हैं, जो इस पूरी प्रक्रिया को समझते हैं. चुनाव आयोग को उनसे भी बात करनी चाहिए थी."
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा भी इतने बड़े पैमाने पर एसआईआर के औचित्य पर सवाल उठाते हैं और इतनी बड़ी संख्या में लोगों के नाम कटने पर भी.
वह कहते हैं कि किसी के शिफ़्ट करने पर, या किसी का नाम दो जगह होने पर, या किसी की मृत्यु होने पर मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया तो सामान्य बात है और हर साल की जाती है. स्पेशल इन्टेंसिव रिवीजन के ज़रिए करोड़ों लोगों की पहचान परेड करवाई जा रही है.
लवासा कहते हैं, "2024 के चुनाव में मतदाता संख्या करीब 98 करोड़ की थी. अब तक जो आंकड़े सामने आए हैं कि 14 करोड़ के करीब लोगों को निकाल दिया गया है या निकाले जाएंगे. एक तरफ तो आबादी बढ़ रही है और दूसरी तरफ हमारे मतदाताओं की संख्या घट रही है."
"जो ईपी रेशो (मतदाता, जनसंख्या का अनुपात) हिंदुस्तान में आज तक 98-99% होता था करीब 8-10% घट जाएगा. आखिर वो लोग कहां जाएंगे जिनका नाम इससे हटाया जाएगा. तो क्या जनगणना त्रुटिपूर्ण है? यह सब बहुत गहन सवाल हैं."
जो लोग इस प्रक्रिया की आलोचना कर रहे हैं, उनका यह कहना है कि ऐसा लग रहा है कि इससे लोगों पर नागरिकता साबित करने का दबाव बनाया जा रहा है. लेकिन अगर कोई व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है तो उसका नाम मतदाता सूची में क्यों हो?
इस सवाल के जवाब में अशोक लवासा कहते हैं कि ऐसे किसी भी व्यक्ति का नाम भारत की मतदाता सूची में नहीं होना चाहिए जो भारत का नागरिक नहीं है. लेकिन मतदाता सूची में किसी वजह से शामिल हो गए ऐसे लोगों को निकालने की प्रक्रिया कानून में पहले से दी गई है.
वह कहते हैं, "कोई भी व्यक्ति यह विरोध कर सकता है, याचिका कर सकता है कि फलाना व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है और यह सबूत है जिससे उसकी नागरिकता पर शक किया जाए. उसके बाद एक नोटिस दिया जाता है और पूछताछ करके ईआरओ (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी) उसका नाम हटा सकता है और विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरनर्स ट्रिब्यूनल) को भेज सकता है."
"27 मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में दो बातें कही गई हैं. एक तो यह कि चुनाव आयोग संवैधानिक दृष्टि से यह शक्तियां रखता है कि वो इस किस्म का गहन संशोधन कराए और दूसरी कि जिन-जिन के ऊपर नागरिकता की वजह से संदेह है, ऐसे सभी मामलों को चार सप्ताह के अंदर चुनाव आयोग विदेशी न्यायाधिकरण को रेफ़र करे."
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