CJP को न सरकार पर भरोसा और ना ही सुप्रीम कोर्ट पर, सरकार के खिलाफ अब अगले आंदोलन की तैयारी! विपक्ष भी बहती गंगा में हाथ धोने को तैयार
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30-07-2026 07:34 PM
काक्रोच जनता पार्टी (CJP) को न सरकार पर भरोसा है, न सर्वोच्च अदालत पर और न पुलिस पर. CJP की नजर में पुलिस मनमानी कर रही है. सरकार के वादे के बावजूद प्रदर्शनकारियों के साथ सख्ती बरती जा रही है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी सीजेपी को एतराज है. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि उन प्रदर्शनकारियों के साथ कोई नरमी न बरती जाए, जिनका आपराधिक रिकार्ड रहा है. सीजेपी नेता सभी प्रदर्शनकारियों को रिहा करने की बात कह रहे हैं, भले उनके खिलाफ पहले से मामले दर्ज हैं. सीजेपी ने पेपर लीक रोकने की सरकार की पहल को नाकाफी बताया है. सीजेपी ने सरकारी नुमाइंदों से हुई वार्ता के बाद धरना-प्रदर्शन तो रोक दिया, लेकिन सरकार पर शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए फिर से आंदोलन की चेतावनी भी दी है.
पेपर लीक बिल से संतुष्ट नहीं
पेपर लीक रोकने के लिए सरकार ने सख्त कानून बनाने की पहल शुरू की है. लोकसभा से इसके लिए विधेयक पारित भी हो गया है. पर, सीजेपी इससे संतुष्ट नहीं है. सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका कहते हैं कि सरकार ने जो बिल लोकसभा में पास कराया है, वह कारगर नहीं होगा. उनका तर्क है कि परीक्षाओं के पेपर लीक रोकने के लिए सीजेपी ने कई सुझाव दिए थे. पहले उन पर अमल होना चाहिए. वे परीक्षा पैटर्न और कोचिंग पर कंट्रोल की बात करते हैं. वे भूल जाते हैं कि सरकार ने इसी काम के लिए नीलेकणि के नेतृत्व में एक्सपर्ट कमेटी बनाई है. यानी आगे भी सुधार की संभावना बरकरार है. इसके बावजूद सीजेपी का असंतुष्ट होना उसके अड़ियन रुख का संकेत है.
एक बात तो साफ हो गई है कि सीजेपी अपने इशारे पर सरकार को नचाना चाहती है. इसके लिए न सिर्फ छात्र-युवा को वह अपने साथ जोड़े रखना चाहती है, बल्कि किसानों को भी साथ लाने के प्रयास में है. किसान आंदोलन खड़ा कर सरकार से अपनी मांगें मनवाने वाले राकेश टिकैत से सीजेपी नेताओं की मुलाकात इसी दिशा में प्रयास है. सीजेपी नेताओं ने देखा है कि किसान आंदोलन से कैसे सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा था. नरेंद्र मोदी की सरकार अपने बीते 12 साल के कार्यकाल में सिर्फ 2 मौकों पर झुकी है. पहली बार किसानों के आगे और दूसरी बार सीजेपी के सामने. अगर दोनों की ताकत मिल जाती है तो निश्चित ही सरकार के सामने मुश्किल पैदा होगी.
सरकार झुकने के मूड में नहीं
सरकार ने सीजेपी की मांगें मान लीं. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सरकार ने करा लिया. प्रदर्शनकारी छात्रों की गिरफ्तारी पर रोक लगाई. गिरफ्तार छात्रों की रिहाई का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इन कामों की तस्दीक करते हुए छात्रों के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई की जांच का आदेश भी दिया है. इसके बावजूद सीजेपी को लगता है कि सरकार के किए काम संतुष्टि प्रदान करने वाले नहीं हैं. सरकार पर दबदबा कायम रखने के लिए सीजेपी फिर से आंदोलन की तैयरी में लगी है. पर, इस बार सीजेपी अपने मकसद में कामयाब होगी, इसमें संदेह है. प्रदर्शनकारियों के आचरण और उनकी गाली-गलौज की शैली से सरकार समर्थक अवाम भी सीजेपी से खफा है. इसलिए लगने लगा है कि सरकार अब और दबाव में आने के मूड में नहीं है.
विपक्ष का सीजेपी को समर्थन
विपक्ष बीते 12 साल में लोकतांत्रिक तरीके से सरकार को पछाड़ नहीं पाया. उल्टे उसकी और दुर्गति होती रही है. इसे विपक्ष जनता का सपोर्ट मानने के बजाय सरकार की तकड़म मानता बताता रहा है. कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और इंडिया ब्लाक में शामिल दूसरे दलों के नेता भाजपा की सफलता के पीछे वोट चोरी की दलील देते रहे हैं. चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया क तहत मतदाताओं के काटे गए नाम को विपक्षी गठबंधन वोट चोरी बताता है. ईवीएम तो तब से उसके निशाने पर है, जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है. ऐसे और भी कई आरोप विपक्ष लगाता रहा है, जो उस पर उल्टा पड़ जाते हैं. सीजेपी प्रदर्शनकारियों के आगे सरकार जिस तरह झुकी, उससे विपक्ष के हौसले बुलंद हुए हैं. वे सैद्धांतिक तौर पर सीजेपीी के साथ हैं, लेकिन उन्हें भय है कि भविष्य में कहीं सीजेपी उन पर ही भारी न पड़ जाए. शायद यही भय रहा कि कांग्रेस ने सीजेपी के मुद्दों पर अपने अंदाज में सरकार को घेरने की कोशिश की, लेकिन जंतर-मंतर के धरने से दूरी बनाए रखी.
राहुल कहते हैं- सरकार गिरेगी
लोकसभा में अपोजिशन लीडर राहुल गांधी ने इसी साल मई-जून में एक गजब की भविष्यवाणी की थी. उन्होंने कहा था कि साल भर के अंदर केंद्र की मोदी सरकार गिर जाएगी. उनकी भविष्यवाणी इसलिए अजूबा थी कि एनडीए के समर्थन से मोदी बहुमत वाली सरकार में पीएम बने हैं. इस बीच टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) के सांसद टूट कर एनडीए का हिस्सा बन गए हैं. सीजेपी के आंदोलन के बाद अब उनकी भविष्यवाणी पर आंशिक भरोसा तो लोगों को होने ही लगा है. धरेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कांग्रेस समेत भाजपा विरोधी विपक्ष के निशाने पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह हैं. संसद में विपक्ष उन्हें घेरने की कोशिश कर रहा है तो सीजेपी सड़क पर अपने आंदोलन से इसका संकेत दे चुकी है. हालांकि भजपा और उसके सहयोगी दलों के समर्थक भी अब किसी अराजकता को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं.
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