ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग, जानिए मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है
Updated on
25-09-2026 10:44 PM
अंग्रेजी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में कहा है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों में भारत निर्वाचन आयोग के फ़ैसलों और कामकाज की प्रक्रिया को लेकर आंतरिक तौर पर आपत्तियां उठाईं.
अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले साल स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न यानी एसआईआर अभियान के दौरान चुनाव आयुक्तों को कई फ़ैसलों की जानकारी नहीं दी गई थी और दोनों चुनाव आयुक्तों ने इन फ़ैसलों पर बार-बार आपत्तियां जताई थीं.
हालांकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय, सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य प्रक्रिया है.
आयोग ने कहा कि एसआईआर समेत पिछले एक साल में लिए गए सभी अंतिम फ़ैसले सर्वसम्मति से हुए हैं.
इंडियन एक्सप्रेस ने कांग्रेस के सूत्रों के हवाले से कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए विपक्षी दल संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाएंगे.
वहीं कॉकरोच जनता पार्टी ने कहा है कि अगर शनिवार तक ज्ञानेश कुमार ने इस्तीफ़ा नहीं दिया तो 2 अक्तूबर से आंदोलन शुरू किया जाएगा.
आइए जानते हैं कि चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे की जाती है और उन्हें कैसे हटाया जा सकता है.
मंत्रिमंडल का एक सदस्य शामिल होता है.
2023 के क़ानून के मुताबिक़, आयुक्त नियुक्त होने वाले शख़्स सचिव स्तर के पद पर रह चुके हों. वो 'ईमानदार' हों और उनके पास चुनावों के प्रबंधन और संचालन का ज्ञान और अनुभव होना चाहिए.
उनका कार्यकाल छह साल या 65 वर्ष की उम्र तक होता है
संविधान के अनुच्छेद 125 के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट के जज का वेतन संसद के बनाए गए क़ानून के ज़रिए तय किया जाना ज़रूरी है.
वहीं, कैबिनेट सचिव का वेतन सरकार केंद्रीय वेतन आयोग की सिफ़ारिश के आधार पर तय करती है.
इसलिए, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के तहत, यह क़ानून वेतन का निर्धारण करने में कार्यपालिका को पहले की तुलना में अधिक अधिकार दे सकता है.
अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की सच्चाई की जांच के लिए जांच कराई जाती है.
इसके लिए एक कमेटी बनाई जाती है, जो कदाचार या अक्षमता से जुड़े सबूतों की जांच करती है.
इसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में "उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों" के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना ज़रूरी है.
प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित होने के बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश देते/देती हैं.
संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति के पास कोई अलग विवेकाधिकार नहीं रहता, क्योंकि इस मामले में राष्ट्रपति को संसद की सलाह के अनुसार काम करना होता है.
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