Gen-Z की नब्ज को मोहन भागवत ने समझा, कैसे युवा पीढ़ी और BJP के बीच ब्रिज बना संघ
Updated on
08-08-2026 01:10 PM
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वैचारिक रिश्तों के बीच, संघ प्रमुख मोहन भागवत का हर एक बयान सियासी गलियारों में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जाता है. संघ प्रमुख जब कभी कोई बात कहते हैं तो कभी-कभी बीजेपी की नीतियों के समर्थन के तौर पर देखा जाता है तो कभी लगता है कि किसी बदलाव या सुधार का संकेत है.
संघ प्रमुख मोहन भागवत का मुंबई में गुरुवार को Gen-Z' और 'Gen-अल्फा' यानी नई युवा पीढ़ी के साथ उनकी बातची सिर्फ एक संवाद नहीं, बल्कि आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक दिशा तय करने वाला एक गहरा वैचारिक संदेश है. Gen-Z की साथ संवाद के दौरान मोहन भागवत के जवाब, भाषा का चुनाव और बॉडी लैंग्वेज अहम संकेत थे.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन खत्म होने के दो हफ्ते बाद युवा पीढ़ी के साथ उनकी बातचीत क बड़ा संकेत है. बीजेपी छात्रों-युवाओं के नब्ज को समझने में नाकाम रही है, आरएसएस ने उसे बाखूबी समझते हुए युवा पीढ़ी को साधने की कोशिश शुरू कर दी है.
संघ प्रमुख का Gen-Z के साथ संवाद
संघ प्रमुख का यह आउटरीच इवेंट उन छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों के बाद हुआ है, जिन्होंने बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से बढ़ती दूरी को उजागर किया, जो अब सत्ता से सवाल पूछने, जवाब मांगने और अपनी शिकायतों को लेकर सड़कों पर उतरने के लिए तैयार है. मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में संघ प्रमुख ने युवाओं के साथ संवाद किया. भागवत शायद ही कभी अंग्रेज़ी में बोलते हों, लेकिन गुरुवार को Gen-Z के साथ संवाद में उसी अंदाज, अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में बातचीत कर रहे थे.
युवा पीढ़ी की शिकायतों को संघ प्रमुख ने सुना और बकायदा माना भी. उन्होंने छात्रों के विरोध करने के अधिकार का बचाव किया. साथ ही इस बात को भी खारिज कर दिया कि विरोध करने वाले युवा 'राष्ट्र-विरोधी' करार दिया जाए. भागवत ने बेरोज़गारी, शिक्षा और आरक्षण के मुद्दे पर बात की. सबसे अहम बात यह रही कि उन्होंने युवा पीढ़ी के बारे में एक बुनियादी बात समझा कि यह सवाल पूछती है और बदले में तार्किक जवाब की उम्मीद करती है.
संघ ने असहमति को देशद्रोह नहीं माना
संघ प्रमुख मोहन भागवत का छात्रों के साथ संवाद के दौरान सबसे अहम राजनीतिक कदम यह था कि उन्होंने असहमति को देशद्रोह नहीं माना. संघ प्रमुख ने कहा कि अगर Gen-Z विरोध कर रहा है,तो यह देश-विरोधी नहीं है. वे हमारे अपने ही लोग हैं, हमारी अगली पीढ़ी हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि Gen Z और Gen-अल्फा मौजूदा पीढ़ी से ज़्यादा ईमानदार हैं, देशभक्ति हैं और सेवा करने का जज्बा रखते हैं.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन के दौरान कई बीजेपी नेताओं ने जिस तरह की भाषा इस्तेमाल की, उससे संघ प्रमुख की बातों की तुलना करते हैं, तो ज़मीन-आसमान का फ़र्क दिखता है. प्रदर्शनकारियों को तरह-तरह से बुरा-भला कहा गया, जैसे कि वे उपद्रवी हैं, अराजकता फैलाने वाले हैं, राजनीतिक मकसद से ऐसा कर रहे हैं, 'भारत-विरोधी' इकोसिस्टम का हिस्सा हैं.
तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सीजेपी को उपद्रवी तत्वों की बी-टीम बताया था तो बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने प्रदर्शनकारियों पर 'अराजकता' फैलाने का आरोप लगाया. वहीं, पार्टी नेता जयवीर शेरगिल ने आरोप लगाया कि NEET आंदोलन को 'भारत-विरोधी अराजकतावादी' गिरोह ने हाईजैक कर लिया है. केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी आंदोलन के मकसद और 'भारत-विरोधी ताकतों' के साथ कथित संबंधों पर सवाल उठाते हुए निशाना साधा था.
राजनीतिक पार्टियां अक्सर विरोध प्रदर्शन और आंदोलनों को टारगेट करती हैं, जो उन्हें चुनौती देते हैं. बीजेपी के लिए समस्या सिर्फ़ यह नहीं थी कि उसके कुछ नेताओं ने विरोध प्रदर्शनों की आलोचना की, समस्या यह थी कि यह आलोचना अक्सर प्रदर्शनकारियों के बारे में पहले से बनी धारणाओं पर आधारित होती थी,न कि उस शिकायत को समझने की कोशिश पर, जिसके कारण वे सड़कों पर उतरे थे. बीजेपी नेताओं के उल्टे मोहनभागवत ने बिल्कुल अलग सोच के साथ शुरुआत की.
विरोध का अधिकार और लोकतंत्र का सबक
संघ प्रमुख भागवत ने यह नहीं कहा कि Gen-Z और युवा पीढ़ी को विरोध करना बंद कर देना चाहिए. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि विरोध भी लोकतांत्रिक बातचीत का एक तरीका हो सकता है. उन्होंने कहा कि विरोध भी बातचीत का एक ज़रिया है और तर्क दिया कि जब संवाद और बातचीत नहीं होती, तो विरोध मुद्दों को चर्चा में लाने का एक तरीका बन जाता है. संघ प्रमुख के द्वारा किया गया यह फ़र्क मायने रखता है.
मोहन भागवत विरोध करने वालों के हर तरीके का समर्थन नहीं कर रहे थे. उन्होंने खास तौर पर डॉ.भीमराव अंबेडकर का ज़िक्र करते हुए कहा कि आंदोलन करने के कुछ तरीके होते है, लेकिन यह बात भी तब कही, जब उन्होंने यह मान लिया था कि युवा इसलिए विरोध कर रहे थे, क्योंकि उन्हें अपनी जिंदगी में असल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था.
भागवत ने कहा कि आंदोलन को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए और उसका समाधान किया जाना चाहिए. संघ के लिए राजनीतिक रूप से यह काम का फ़र्क है, यह किसी शिकायत की जायज बात को विरोध के दौरान की गई हर कार्रवाई की जायज बात से अलग करता है.
सीजेपी आंदोलन के दौरान बीजेपी की प्रतिक्रिया ने अक्सर इसी फ़र्क को धुंधला कर दिया. नतीजा यह हुआ कि परीक्षा में गड़बड़ियों और NEET-UG पेपर लीक को लेकर शुरू हुआ विरोध धीरे-धीरे एक बड़ी बहस में बदल गया कि क्या युवा भारतीयों को सरकार के सिस्टम पर सवाल उठाने का अधिकार है भी या नहीं.
जब तक केंद्र सरकार बातचीत के लिए आगे बढ़ी और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की अहम राजनीतिक मांग को माना, तब तक विरोध का महत्व उसकी शुरुआती वजह से कहीं ज़्यादा बढ़ चुका था.
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