अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल वैश्विक टैरिफ़ लगाते वक़्त अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया.
सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसले में कहा कि ट्रंप 1977 के क़ानून 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' यानी आईईपीए का उपयोग करके दुनिया के लगभग हर देश से आयात पर टैरिफ़ नहीं लगा सकते थे.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने टैरिफ से हासिल क़रीब 130 अरब डॉलर के रिफ़ंड की संभावना खुली छोड़ी है. यह मुद्दा आगे किसी अन्य अदालती विवाद में जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के कुछ घंटों बाद ट्रंप ने एक वैकल्पिक क़ानून, ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 122, के तहत एक घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जो उन्हें सभी देशों के सामान पर नया अस्थायी 10 प्रतिशत टैरिफ़ लगाने की अनुमति देता है. शनिवार को उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि वो इन नए टैरिफ़ को 15 प्रतिशत तक बढ़ाने जा रहे हैं.
कौन से टैरिफ़ अवैध पाए गए और क्यों?
20 फ़रवरी को जारी सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केवल उन टैरिफ़ पर लागू होता है, जिन्हें ट्रंप ने आईईपीए के तहत लागू किया था.
यह क़ानून राष्ट्रपति को आपात स्थिति में व्यापार नियंत्रित करने की शक्ति देता है.
ट्रंप ने फ़रवरी 2025 में इस क़ानून का पहली बार उपयोग करते हुए चीन, मेक्सिको और कनाडा से आने वाले सामान पर टैरिफ़ लगाया था. ट्रंप ने कहा था कि फेंटानिल की तस्करी एक आपात स्थिति है.
कुछ महीनों बाद, जिसे ट्रंप ने "लिबरेशन डे" कहा, उन्होंने टैरिफ़ दायरा बढ़ाते हुए लगभग सभी देशों पर 10 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक लगा दिए.
इस क़दम के पीछे अमेरिकी व्यापार घाटे को "असाधारण और असामान्य ख़तरा" बताया गया.
अदालत ने कहा कि नए टैरिफ़ लगाने की संवैधानिक शक्ति कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं. साथ ही आईईपीए का मक़सद राजस्व जुटाना नहीं है.
हालांकि, पिछले साल लगाए गए कुछ टैरिफ़ इस फ़ैसले से प्रभावित नहीं हैं.
इनमें स्टील, एल्युमिनियम, लकड़ी और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों पर लगाए गए उद्योग-विशेष टैरिफ़ शामिल हैं, जिन्हें ट्रंप ने ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट 1962 की धारा 232 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर लागू किया था. ये टैरिफ़ सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद जारी रह सकते हैं.