चीन की 'आंखों का मर गया पानी', शशि थरूर ने लिखा, भारत-नेपाल के साथ लेनदेन वाला रवैया रखता है बीजिंग
Updated on
04-09-2026 02:46 PM
कांग्रेस के दिग्गज नेता शशि थरूर ने हाल ही में आई नेपाल आपदा पर एक लेख लिखा है। इसमें उन्होंने हिमालयी एशिया की नाज़ुक और आपस में जुड़ी हुई पारिस्थितिक सच्चाई बयान की है। शशि थरूर ने लिखा-एक सम्मेलन में सत्ताधारी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता रबी लामिछाने ने एक ऐसी मार्मिक बात कही जो आम राजनयिक बातों से कहीं अलग और गहरी थी।
उन्होंने चलते-चलते यह बात कही कि भारत, चीन और नेपाल के बीच चाहे जो भी भू-राजनीतिक तनाव, रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता या सीमा विवाद हों, ये तीनों देश अनिवार्य रूप से एक ही एकीकृत पर्वत प्रणाली का हिस्सा हैं। उनकी बातों ने काठमांडू में मौजूद लोगों की उस साझा भावना को उजागर किया। यह त्रासदी केवल एक अलग-थलग स्थानीय घटना नहीं थी, बल्कि तेजी से बढ़ती ग्लोबल वॉर्मिंग का एक स्पष्ट प्रमाण थी।
नेपाल कम प्रदूषण फैलाता है, मगर भुगतता ज्यादा: शशि थरूर
थरूर ने लिखा-यह एक कड़वी विडंबना है कि नेपाल, जिसका ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन न के बराबर है, उसे वैश्विक जलवायु परिवर्तन के सबसे कठोर और तत्काल परिणामों का सामना करना पड़ता है, जबकि उसके विशाल और अत्यधिक औद्योगिक पड़ोसी खासकर उत्तर की ओर स्थित देश वायुमंडलीय वॉर्मिंग के उस बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं, जिसके कारण हिमालय के ग्लेशियर टूट रहे हैं। थरूर का इशारा जाहिर है चीन की ओर था, जो नेपाल के उत्तर में है।
ग्लेशियर सीमाओं को नहीं मानते हैं: थरूर
थरूर ने लिखा-ग्लेशियर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानते और न ही ग्लेशियर से बनी झीलें, नदियों के बेसिन या हवा की धाराएं ऐसा करती हैं। जब ग्लेशियर की झील फटती है, या जमीन खिसकने से किसी सीमा-पार बहने वाली नदी का रास्ता रुक जाता है, या बर्फ और चट्टानों के गिरने से लाखों क्यूबिक मीटर पिघला हुआ पानी निकलता है और एक 'बैरियर झील' बन जाती है जो कभी भी फट सकती है, तो उससे आने वाला सैलाब देशों की सीमाओं को पार करके नीचे की ओर बहता है।
भारत-नेपाल डेटा को लेकर चीन से जता चुके हैं नाराजगी: थरूर
थरूर ने कहा-ऐसा संस्थागत ढांचा बनाने के लिए इस क्षेत्र में पर्यावरण से जुड़ी पारदर्शिता के पिछले रिकॉर्ड का सही-सही आकलन करना जरूरी है। हिमालय में ऊपर की ओर और नीचे की ओर स्थित देशों के बीच सहयोग का इतिहास हमेशा से एक जैसा नहीं रहा है; यह अक्सर जरूरत पड़ने पर ही किया गया है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गोपनीयता की वजह से सीमित रहा है।
भारत और नेपाल, दोनों ने ही चीन द्वारा साझा किए गए पानी और जमीन से जुड़े डेटा की क्वालिटी, उसे कितनी बार साझा किया गया और समय पर मिलने जैसी बातों को लेकर बार-बार गहरी नाराजगी जताई है।
चीन का तिब्बत पर नियंत्रण, जहां से आती हैं नदियां
चीन तिब्बती पठार पर नियंत्रण रखता है, जो एशिया की प्रमुख नदी प्रणालियों के लिए पानी का मुख्य स्रोत है। इन नदियों में यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र), सिंधु और गंगा की ऊपरी सहायक नदियां (जैसे भोटे कोशी और करनाली) शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों में, मानसून के मौसम में पानी से जुड़ा डेटा साझा करने के मामले में बीजिंग का रवैया ज्यादातर लेन-देन वाले द्विपक्षीय समझौतों पर आधारित रहा है, न कि अपने-आप डेटा साझा करने की खुली प्रतिबद्धताओं पर। अक्सर, अहम मौकों पर नदी के निचले बहाव वाले देशों को अंधेरे में रखा गया है।
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