Select Date:

योगेंद्र यादव से राघव चड्ढा तक... केजरीवाल के 'वफादारों' के AAP से दूर होने की Inside Story

Updated on 04-04-2026 10:29 PM
आम आदमी पार्टी आज एक ऐसे जगह पर खड़ी है, जहां 'वफादारी' विचारधारा से बड़ी हो गई है. जो पार्टी सिद्धांतों की नींव पर खड़ी हुई थी, वो अब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और 'अपनों' के ही विद्रोह के बीच झूल रही है. राघव चड्ढा का 'खामोश अलगाव' महज एक दूरी नहीं, बल्कि उस पैटर्न का हिस्सा है, जिसने योगेंद्र यादव से लेकर स्वाति मालीवाल तक को किनारे लगा दिया.
राजनीतिक धोखे अक्सर शोर मचाकर नहीं आते. सबसे ज्यादा चुभने वाले विश्वासघात वे नहीं होते जिनकी आहट पहले से सुनाई दे जाए. जब कोई वैचारिक विरोधी दुश्मन बन जाए या कोई प्रतिद्वंद्वी चाल चले, तो एक तसल्ली रहती है कि यह तो सियासत का पुराना नियम है. लेकिन सबसे गहरा दुख तब होता है, जब कोई 'वफादार' चुपचाप दूर होने लगता है. वह पीठ में छुरा नहीं घोंपता.

वो बस साथ देना छोड़ देता है. वो धीरे-धीरे अपनी राह को जुदा कर जाता है और एक दिन दूसरी तरफ खड़ा नजर आता है. यही राघव चड्ढा की कहानी है, यही अरविंद केजरीवाल की नियति है और यही आम आदमी पार्टी का अब तक का सबसे मानवीय, लेकिन कड़वा अध्याय भी है. आम आदमी पार्टी में राघव चड्ढा का उदय किसी फिल्मी पटकथा जैसा था.
साल 2012 में एक युवा चार्टर्ड अकाउंटेंट के तौर पर लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने से शुरू हुआ सफर उन्हें पार्टी के सबसे ताकतवर अंदरूनी घेरे तक ले गया. चड्ढा सिर्फ एक चेहरा नहीं थे, वे केजरीवाल का भरोसा थे. उनकी सगाई अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा के साथ कपूरथला हाउस में हुई. वो जगह जो पंजाब के मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास है. 

खुद अरविंद केजरीवाल ने वहां मौजूद होकर इस रिश्ते को अपनी स्वीकृति दी थी. यह किसी बॉस का अपने कर्मचारी के प्रति व्यवहार नहीं था, यह एक बड़े भाई का संदेश था कि ये मेरा 'अपना' है. लेकिन आज वही अपनापन एक रहस्यमयी खामोशी में बदल चुका है. दरार तब ज्यादा दिखी जब केजरीवाल जेल में थे और पार्टी को अपने सबसे प्रखर वक्ताओं की जरूरत थी. 

उस समय राघव चड्ढा आंख की बीमारी का हवाला देकर लंदन चले गए. पार्टी के गलियारों में यह चर्चा आम हो गई कि जब सबसे कठिन समय आया, तो उन्होंने आंदोलन के बजाय खुद को चुना. वापसी के बाद भी उनकी चुप्पी नहीं टूटी. यहां तक कि शराब नीति मामले में केजरीवाल को मिली राहत पर भी उनकी ओर से वो उत्साह नहीं दिखा, जिसकी उम्मीद की जा रही थी.

आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने इसे 'सॉफ्ट PR' करार दिया, तो दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना ने बेहद तीखे लहजे में यहां तक कह दिया, ''हम केजरीवाल के सिपाही हैं. हम जेल जाने से डरकर भागने वाले नहीं हैं.'' यह हमला सीधा था और निशाने पर राघव चड्ढा ही थे. केजरीवाल की राजनीति की सबसे बुनियादी मांग 'समर्पण' है. 
यहां आप अपनी निजी पहचान को नेता के नैरेटिव में इस तरह विलीन कर देते हैं कि आपके अस्तित्व का एकमात्र पर्याय 'केजरीवाल' बन जाता है. केजरीवाल ने राघव चड्ढा को मंच दिया, पहचान दी, लेकिन उन्होंने उसी पहचान का इस्तेमाल कर खुद को उस कद तक पहुंचा दिया, जहां वो अब केजरीवाल की छत्रछाया में समा नहीं पा रहे. यह कोई पहली बार नहीं है. 

योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, नवजोत सिद्धू और स्वाति मालीवाल, ये लंबी सूची है. केजरीवाल की कार्यशैली स्पष्ट है. यहां कोई 'वफादार विपक्ष' नहीं हो सकता. या तो आप पूरी तरह समर्पित हैं या फिर आप गद्दार हैं. इस पूरी कहानी को समझने के लिए मार्च 2015 के उस 'अध्याय' को याद करना होगा, जब 'आप' ने दिल्ली में जीत के ठीक एक महीने बाद अपने संस्थापकों को ही बाहर कर दिया था. 

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को राष्ट्रीय परिषद की बैठक से जिस तरह निकाला गया, उसे उन्होंने लोकतंत्र की हत्या कहा था. मेधा पाटकर जैसी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उसी दिन पार्टी का साथ छोड़ दिया. केजरीवाल ने तब कहा था, "साथियों ने धोखा दिया." इसी एक वाक्य ने भविष्य की राजनीति तय कर दी थी. आंतरिक विरोध को यहां आलोचना नहीं, दुश्मन की साजिश माना जाता है.
कुमार विश्वास की कहानी भी इसी पैटर्न की गवाह है. वो शख्स जो भीड़ जुटाता था, जो अपनी शायरी से क्रांति को कविता बना देता था, उसे राज्यसभा का टिकट न देकर हाशिए पर धकेल दिया गया. आम आदमी पार्टी का फॉर्मूला बेहद कठोर है. यहां काबिलियत को आमंत्रित किया जाता है, लेकिन वफादारी की शर्त रखी जाती है. जैसे ही कोई महत्वाकांक्षा सिर उठाती है, उसे कुचल दिया जाता है.

राघव चड्ढा इस सिलसिले का सिर्फ सबसे नया नाम हैं, आखिरी नहीं. जब तक पार्टी का ढांचा 'सिपाहियों' की तलाश में रहेगा, काबिल और महत्वाकांक्षी लोग इसी तरह एक-एक करके दूर होते रहेंगे. अंत में शायद मैदान में सिर्फ एक ही शख्स बचेगा, लेकिन तब तक वो 'आंदोलन' जिसकी कसमें खाई गई थीं, दम तोड़ चुका होगा

अन्य महत्वपुर्ण खबरें

 23 April 2026
शिवसेना यूबीटी सांसद संजय राउत ने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों पर कहा कि ये दोनों चुनाव लोकतंत्र, लोगों के अधिकार और संविधान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. गुरुवार…
 21 April 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के लिए आज शाम प्रचार थम जाएगा लेकिन इससे पहले राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय…
 21 April 2026
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल को सोमवार की शाम उस वक्त बड़ा झटका लगा जब हाई कोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज कर…
 21 April 2026
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चेन्नई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी को आतंकवादी कह दिया. कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा है कि मोदी आतंकवादी हैं और उनकी पार्टी…
 20 April 2026
पश्चिम बंगाल चुनाव में पहले चरण की वोटिंग से पहले ही बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच लगातार झड़पों की खबरें सामने आ रही हैं. देर रात एक TMC…
 19 April 2026
भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर को यदि मोदी युग कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक दशक में न केवल देश की सत्ता संभाली,…
 18 April 2026
वोटर लिस्ट में नाम शामिल किए जाने को लेकर सोनिया गांधी के खिलाफ आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर शनिवार को दिल्ली के राउज अवेन्यू कोर्ट में सुनवाी हुई कोर्ट ने सोनिया…
 18 April 2026
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कोलकाता की सड़कों पर उतरकर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जोरदार प्रचार किया। उन्होंने…
 18 April 2026
लोकसभा में महिला आरक्षण बिल गिर गया है। इस बिल के समर्थन में 298 सदस्यों ने वोट किया, जबकि विरोध में 230 सदस्यों ने वोट किया। बिल पर वोटिंग से…
Advt.