खास बातचीत :साहित्यकार चंद्रकांति आर्य-साहित्य शब्दों का अलंकार नहीं, आत्मा का प्रकाश है : चन्द्रकांति आर्य
Updated on
26-07-2026 10:52 PM
भोपाल। समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर अपनी लेखनी बुलंद करने तथा कविता विधा पर मजबूत लेखनी दर्ज कराने वाली वाली प्रदेश की जानीमानी साहित्यकार चंद्रकांति आर्य का मानना है कि साहित्य शब्दों का अलंकार नहीं, आत्मा का प्रकाश है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, संस्कृति की धड़कन है। समय बदलता रहेगा, अभिव्यक्ति के माध्यम बदलते रहेंगे, किंतु साहित्य का मूल उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य बनाए रखना है। यदि हमारी लेखनी किसी एक हृदय में भी संवेदना जगा सके, किसी एक मन में आशा का दीप जला सके, तो वही साहित्य की सबसे बड़ी सार्थकता है। आधुनिक साहित्य, भाषा-शैली और उसके बदलते स्वरूप पर साहित्यकार चंद्रकांति आर्य से विशेष बातचीत के मुख्य अंश.......
प्रश्न . आज के दौर में आधुनिक साहित्य को आप किस रूप में देखती हैं?
उत्तर : साहित्य समय का सबसे विश्वसनीय दस्तावेज होता है। आधुनिक साहित्य केवल नई तकनीक या नए विषयों का नाम नहीं है, बल्कि बदलते समाज, बदलती संवेदनाओं और मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व की सशक्त अभिव्यक्ति है। आज का साहित्य व्यक्ति की अकेलेपन से लेकर वैश्विक चुनौतियों तक हर विषय को अपने भीतर समेट रहा है। साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी संवेदनाओं से जोड़ना भी है।
प्रश्न .भाषा-शैली में आए बदलाव को आप किस दृष्टि से देखती हैं?
उत्तर : भाषा एक जीवंत नदी है, जो समय के साथ अपना प्रवाह और विस्तार बदलती रहती है। आज की भाषा अधिक सहज, संवादपरक और जनसुलभ हुई है। यह परिवर्तन स्वाभाविक है, लेकिन इस प्रक्रिया में भाषा की गरिमा, शुद्धता और सांस्कृतिक आत्मा का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। भाषा जितनी सरल हो, उतनी ही अर्थगर्भित भी होनी चाहिए।
प्रश्न . क्या सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने साहित्य को नई दिशा दी है?
उत्तर : निश्चित रूप से। डिजिटल माध्यमों ने साहित्य को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाया है। जो लेखक पहले सीमित दायरे में पढ़े जाते थे, वे आज विश्वभर के पाठकों से संवाद कर रहे हैं। किंतु इसके साथ एक चुनौती भी है—तात्कालिक लोकप्रियता की होड़ में साहित्य की गहराई और चिंतन कहीं कमजोर न पड़ जाए। साहित्य का मूल्य 'लाइक्स' से नहीं, उसके स्थायी प्रभाव से तय होता है।
प्रश्न .आज के युवा साहित्यकारों के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर : लेखन केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि साधना है। अधिक पढ़िए, जीवन को निकट से देखिए, समाज की पीड़ा और प्रकृति की सुंदरता को महसूस कीजिए। मौलिकता को अपनाइए और किसी की शैली की नकल करने के बजाय अपनी पहचान गढ़िए। साहित्य में सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।
प्रश्न . क्या आधुनिकता के कारण साहित्य अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है?
उत्तर : आधुनिकता का अर्थ परंपरा से विमुख होना नहीं है। सच्चा साहित्य वही है जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर नए समय की चुनौतियों का उत्तर दे। परंपरा हमें आधार देती है और आधुनिकता हमें विस्तार देती है। इन दोनों का संतुलन ही श्रेष्ठ साहित्य की पहचान है।
*प्रश्न . स्त्री लेखन को आप आज किस मुकाम पर देखती हैं?*
*उत्तर :* आज स्त्री लेखन केवल नारी-विमर्श तक सीमित नहीं है। महिलाएँ समाज, राजनीति, पर्यावरण, विज्ञान, संस्कृति और मानवीय संबंधों जैसे विविध विषयों पर गंभीर लेखन कर रही हैं। यह साहित्यिक परिदृश्य के लिए अत्यंत सकारात्मक संकेत है। स्त्री की दृष्टि साहित्य को संवेदना, संतुलन और नई वैचारिक ऊर्जा प्रदान करती है।
*प्रश्न . साहित्य का समाज निर्माण में क्या योगदान है?*
*उत्तर :* साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, उसका पथ-प्रदर्शक भी है। यह मनुष्य में करुणा, सहिष्णुता, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का विकास करता है। जब समाज भौतिकता की ओर अधिक झुकता है, तब साहित्य उसे आत्ममंथन का अवसर देता है। एक सशक्त साहित्य ही संवेदनशील समाज की आधारशिला रखता है।
*प्रश्न . आपके अनुसार एक श्रेष्ठ साहित्यकार की सबसे बड़ी पहचान क्या होती है?*
*उत्तर :* श्रेष्ठ साहित्यकार वह है जो समय की नब्ज़ पहचान सके, मनुष्य के भीतर के मौन को शब्द दे सके और सत्य को निर्भीकता से अभिव्यक्त कर सके। उसका लेखन केवल वर्तमान के लिए नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बने। साहित्यकार की सबसे बड़ी पूँजी उसकी संवेदनशीलता और उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता होती है।
*प्रश्न . आज के समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और तकनीक के बढ़ते प्रभाव को साहित्य के संदर्भ में आप कैसे देखती हैं?*
*उत्तर :* तकनीक मनुष्य की सहायक हो सकती है, उसका विकल्प नहीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता सूचना दे सकती है, भाषा का विन्यास कर सकती है, लेकिन वह जीवन की अनुभूतियों, संवेदनाओं और आत्मानुभव की गहराई को नहीं रच सकती। साहित्य का जन्म हृदय की पीड़ा, प्रेम, संघर्ष, करुणा और आत्ममंथन से होता है। इसलिए तकनीक का उपयोग सृजन को समृद्ध करने के लिए होना चाहिए, उसका स्थान लेने के लिए नहीं। सृजन की आत्मा सदैव मनुष्य के भीतर ही रहेगी।
प्रश्न . यदि आपको एक पंक्ति में साहित्य की शक्ति को परिभाषित करना हो, तो आप क्या कहेंगी?
उत्तर : मैं कहूँगी कि "साहित्य वह दीप है, जो युगों के अंधकार में भी मनुष्यता का प्रकाश बनाए रखता है।" साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि सभ्यता की स्मृति, संस्कृति की चेतना और भविष्य की दिशा है। जब इतिहास मौन हो जाता है, तब साहित्य बोलता है; जब समाज संवेदनहीन होने लगता है, तब साहित्य उसे मानवीय मूल्यों का बोध कराता है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति और शाश्वत प्रासंगिकता है।
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