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'भारत और रूस में 3000 सैनिकों की तैनाती का समझौता अमेरिका को संदेश', RELOS पैक्ट को एक्सपर्ट ने बताया गेमचेंजर

Updated on 23-04-2026 03:13 PM
भारत और रूस के बीच RELOS (लॉजिस्टिक्स सपोर्ट का आपसी आदान-प्रदान) समझौते की जानकारी मॉस्को ने जारी की है। इससे बीते साल हुए इस पैक्ट के बारे में डिटेल मिल गई है। यह समझौता दोनों देशों को एक-दूसरे के क्षेत्र में अपनी सेना, युद्धपोत और विमान तैनात करने की अनुमति देता है। एक्सपर्ट का मानना है कि भारत-रूस सैन्य लॉजिस्टिक्स समझौता आर्कटिक से लेकर हिंद महासागर तक गेम-चेंजर साबित होगा। यह दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाएगा। साथ ही पाकिस्तान की तरफ झुकते अमेरिका को भी संदेश देगा।
दिल्ली स्थित सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज के पूर्व महानिदेशक एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त) ने आरटीइंडिया में लिखे लेख में बताया है कि कैसे यह समझौता दोनों देशों और दुनिया पर असर डालेगा। उनका मानना है कि जनवरी 2026 को लागू हुआ यह समझौता भारत के दृढ़ रुख, रूस की दृढ़ता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन के एक अधिक जटिल समीकरण की ओर बढ़ते कदम को दिखाता है।
भू-राजनीतिक और रणनीतिक अहमियत
भूराजनीतिक रूप से यह समझौता रूस के साथ संबंधों को गहरा करके भारत की रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाता है। साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अन्य प्रमुख ताकतों के मुकाबले शक्ति संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। रणनीतिक रूप से यह रूस को समुद्री विविधता के लिए IOR तक पहुंचने में सक्षम बनाता है, जबकि भारत को आर्कटिक और प्रशांत क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति प्रदान करता है। यह केवल बंदरगाहों पर जहाजों के रुकने और अभ्यासों तक सीमित नहीं है।

भारत-रूस को इससे एक रणनीतिक फुटहोल्ड मिलता है। रूस को गर्म पानी वाले बंदरगाहों तक अधिक पहुंच की सख्त जरूरत है। रूसी सैनिक और उपकरण भारत या अंडमान द्वीप समूह में तैनात किए जा सकते हैं, जिससे उन्हें IOR तक पहुंच मिल जाएगी। रूस को दक्षिण-पूर्व एशिया तक अधिक पहुंच मिलेगी। पश्चिमी प्रशांत और आर्कटिक तक भारत की बढ़ती पहुंच के महत्वपूर्ण फायदे हैं। स्थायी रूप से तैनात सैनिक और उपकरण लगातार संयुक्त अभ्यासों में शामिल हो सकते हैं।
भारत को कैसे होगा फायदा
भारत और रूस के युद्ध का अनुभव है। दोनों देशों के पास एक-दूसरे से सीखने के लिए बहुत कुछ है। यह आसानी से हासिल किया जा सकेगा, जब सैनिक लंबे समय तक एक साथ तैनात रहेंगे। दोनों देशों के लिए जरूरी है कि वे कॉग्निटिव ऑपरेशन, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, हाइपरसोनिक मिसाइलों और निर्देशित ऊर्जा हथियारों में नई तकनीकों के उपयोग से जुड़े अपने अनुभव साझा करें।
रक्षा संबंधों में होगा सुधार
RELOS दोनों सेनाओं के बीच तालमेल को बढ़ाएगा और रूस के 40 सैन्य अड्डों के नेटवर्क का इस्तेमाल करके लंबी दूरी की तैनाती को मुमकिन बनाकर भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति को मजबूत करेगा। यह समझौता भारत और उसके सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक के बीच सैन्य सहयोग और लॉजिस्टिक्स सहायता को बढ़ावा देता है
समझौता भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि यह भारत के 60 से 70% सैन्य साजो-सामान के रखरखाव में मदद करता है, जो रूसी मूल का है। इसमें पनडुब्बियां, Su-30MKI और S-400 सिस्टम शामिल हैं। RELOS भारतीय नौसेना और वायुसेना की ऑपरेशनल पहुंच और सहनशक्ति को बढ़ाता है। खासतौर से दूरदराज के ऑपरेशन के लिए लॉजिस्टिक्स की तैयारी को बेहतर बनाता है।

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