वंदे मातरम को लेकर रवींद्रनाथ टैगोर की क्या राय थी, उन्होंने कांग्रेस से क्या कहा था?
Updated on
21-08-2026 07:34 PM
कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडब्ल्यूसी) ने फ़ैसला किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो पद ही गाए जाएंगे.
यह फ़ैसला स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम और बाद में गोवा में हुए एक कार्यक्रम में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर बीजेपी के हमलों के बीच लिया गया है.
कांग्रेस ने 1937 के सीडब्ल्यूसी में पास हुए प्रस्ताव का हवाला दिया है. पार्टी का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं, जिनमें महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर शामिल थे, ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल पहले दो पद गाए जाने का समर्थन किया था.
वंदे मातरम के बाक़ी के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं, जिनमें दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के संदर्भ शामिल हैं, और भारत को एक पूजनीय देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब संसद ने वंदे मातरम को क़ानूनी संरक्षण दिया है.
रवींद्रनाथ टैगोर क्या सोचते थे?
इतिहासकार मृदुला मुखर्जी ने पिछले साल 11 दिसंबर को द वायर के लिए वरिष्ठ पत्रकार करण थापर से एक इंटरव्यू में कहा था कि बंगाल में स्वदेशी और बंग-भंग विरोधी आंदोलनों के दौरान टैगोर ने सड़कों पर वंदे मातरम गाकर इसे लोकप्रिय बनाया था.
मृदुला मुखर्जी ने कहा था, ''जब कांग्रेस में गीत को लेकर सवाल उठे तो आपत्तियों पर विचार करने के लिए एक उपसमिति बनाई गई और उसने टैगोर से सलाह ली. इसकी वजह यह थी कि टैगोर ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने इस वंदे मातरम को गुमनामी से निकालकर लोकप्रिय बनाया, इसे संगीत दिया और 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार गाया."
मृदुला मुखर्जी ने कहा था, ''टैगोर ने नेहरू को लिखे पत्र में सलाह देते हुए कहा था- "मैं यह मानता हूँ कि बंकिम की पूरी वंदे मातरम कविता को उसके संदर्भ के साथ पढ़ने पर उसकी व्याख्या ऐसे तरीक़ों से की जा सकती है, जो मुस्लिम भावनाओं को आहत कर सकते हैं.''
लेकिन उससे निकला एक राष्ट्रगीत, जो स्वाभाविक रूप से केवल पहले दो पदों तक सीमित हो गया है. उसकी अपनी एक अलग पहचान और प्रेरणादायक महत्व बन गया है, जिसमें मुझे किसी भी संप्रदाय या समुदाय को ठेस पहुँचाने वाली कोई बात दिखाई नहीं देती."
मृदुला मुखर्जी ऐतिहासिक पत्राचार का उल्लेख करते हुए कहा था कि सुभाष चंद्र बोस ने व्यक्तिगत रूप से टैगोर से बात की थी और उनसे वंदे मातरम के मुद्दे को महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के सामने उठाने का अनुरोध किया था. अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वंदे मातरम मामले में नेहरू पर तुष्टीकरण का आरोप लगाते हैं तो टैगोर और महात्मा गांधी को भी, जिन्होंने इस फ़ैसले का समर्थन किया था, उतना ही दोषी माना जाना चाहिए.
साहित्य अकादमी से 1994 में प्रकाशित 'द इंग्लिश राइटिंग्स ऑफ रवींद्रनाथ टैगोर: अ मिसलैनी' में भी वंदे मातरम पर टैगोर की टिप्पणी है.
टैगोर ने कहा है, "मुस्लिम भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, राष्ट्रीय गीत ऐसा होना चाहिए जो मूल रचना से लिया गया हो, लेकिन स्वाभाविक रूप से मूल कविता के केवल पहले दो पदों तक सीमित हो. हर बार इसे सुनते या गाते समय हमें पूरी कविता और उससे भी कम उस कहानी की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, जिसके साथ यह संयोगवश जुड़ गई थी. इस गीत ने अपनी एक अलग पहचान और प्रेरणादायक महत्व हासिल कर लिया है, जिसमें मुझे किसी भी संप्रदाय या समुदाय के लिए आपत्तिजनक कुछ भी दिखाई नहीं देता."
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'वंदे मातरम्' 1875 में लिखा था. इसके बाद इसके अन्य पदों को उनके 1882 के उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया गया था.
वरिष्ठ लेखक और पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने 14 अगस्त को फ्रंटलाइन में प्रकाशित एक लेख में कहा है, ''30 अक्तूबर 1937 को टैगोर ने एक नोट की शुरुआत यह कहते हुए की कि "वंदे मातरम को लेकर एक दुर्भाग्यपूर्ण विवाद चल रहा है." उन्होंने इसमें लिखा कि उन्हें इस गीत के पहले पद को मूल रूप से संगीतबद्ध करने का "सौभाग्य" मिला था.
''उन्होंने कहा कि पहले हिस्से में व्यक्त कोमलता और भक्ति की भावना के साथ मातृभूमि के सुंदर और कल्याणकारी रूपों पर दिए गए ज़ोर के कारण ये बाक़ी के हिस्सों से बिल्कुल अलग दिखा. टैगोर का निष्कर्ष स्पष्ट था.''
''आख़िरी चार पद उत्तेजक या भड़काऊ प्रकृति के थे, जबकि पहले दो पदों का अपना स्वतंत्र अर्थ और पहचान बन चुकी थी और उन्हें बिना किसी विवाद के सभी समुदायों में स्वीकार किया जा सकता था. उनका मानना था कि केवल पहले दो पदों का स्वर धर्मनिरपेक्ष था और वे मुख्य रूप से मातृभूमि की भौगोलिक सुंदरता का गुणगान करते थे. 1939 में हरिजन के एक अंक में महात्मा गांधी ने भी लगभग इन्हीं शब्दों में टैगोर के विचारों का समर्थन किया.''
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