तमिलनाडु में ब्राह्मणों को टिकट देने से क्यों बच रही बड़ी पार्टियां? समझिए क्या है रणनीति
Updated on
06-04-2026 01:24 PM
तमिलनाडु में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों से पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। इन सभी सूचियों में एक खास पैटर्न नजर आ रहा है। यह पैटर्न है लिस्ट से ब्राह्मणों का नदारद होना। राज्य में जीत की दावेदारी पेश करने वाली बड़ी पार्टियां इस बार के चुनावों में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देने में किनारा करती दिखी है। इसके पीछे कई वजहें हैं और राजनीतिक विश्लेषक इसे राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव बता रहे हैं। बता दें कि राज्य की आबादी में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी करीब 3 प्रतिशत है।
अलग-अलग पार्टियों की बात करें तो करीब 35 साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि अन्नाद्रमुक ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा है। मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद से करीब 10 सालों में अन्नाद्रमुक ने केवल एक ब्राह्मण उम्मीदवार को मौका दिया है। पार्टी ने 2021 के चुनावों में पूर्व पुलिस महानिदेशक आर नटराज को उम्मीदवार बनाया गया था।
किसने दिया मौका, किसने नहीं?
यही स्थिति दूसरी बड़ी पार्टियों की भी है, जिनकी सूची में भी इस बार ब्राह्मण उम्मीदवार नजर नहीं आ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने भी 27 सीटों में से किसी पर ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा। वहीं द्रमुक और कांग्रेस ने भी किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया। इसके अलावा अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम ने दो ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं। तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी नाम तमिलर कच्ची ने छह ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। इन दलों ने मायिलापुर और श्रीरंगम जैसे क्षेत्रों को चुना है, जहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या ज्यादा है।
AIADMK ने क्यों नहीं उतारे ब्राह्मण उम्मीदवार?
इन आंकड़ों से यह साफ है कि राज्य की राजनीति में ब्राह्मणों का प्रभाव घट रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ब्राह्मण मतदाता लंबे समय तक अन्नाद्रमुक के साथ रहे, लेकिन हाल के वर्षों में उनका झुकाव भारतीय जनता पार्टी की ओर बढ़ा है। इसी कारण अब यह पार्टी ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने में चुनावी लाभ नहीं देख रही है। राजनीतिक टिप्पणीकार रवींद्रन दुरईसामी का कहना है कि AIADMK ने ब्राह्मण समुदाय के साथ अन्याय किया है। उनके मुताबिक जया और MGR ब्राह्मण उम्मीदवारों को हमेशा मैदान में उतारते थे।
वही टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार के हवाले से बताया, “AIADMK ने दशकों तक ब्राह्मणों का समर्थन बनाए रखा था। लेकिन हाल के सालों में इसमें बदलाव आया है। जयललिता के निधन के बाद, ब्राह्मण मतदाता BJP की ओर चले गए हैं। नतीजतन, AIADMK को अब ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारने में कोई चुनावी फ़ायदा नहीं दिखता, जिससे उनका प्रतिनिधित्व कम हो गया है।
विश्लेषकों ने बताई वजहें
TVK के मामले में, उम्मीदवारों के चयन के पीछे कोई स्पष्ट तर्क नजर नहीं आता। पार्टी ने ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाया है, जबकि पेरियार उसके पाँच आदर्शों में से एक हैं। रवींद्रन दुरईस्वामी कहते हैं, "शायद TVK यह संदेश देना चाहती है कि वह ब्राह्मण-विरोधी पार्टी नहीं है।" इसके अलावा DMK को लेकर विश्लेषक अरुण ने कहा, "DMK के पास ब्राह्मणों को बाहर रखने का कोई औपचारिक कारण नहीं है, लेकिन उसकी राजनीतिक स्थिति गैर-ब्राह्मणों के सशक्तिकरण पर केंद्रित है।”
वहीं NTK द्वारा छह ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारने के पीछे के तर्क पर, विश्लेषक कहते हैं कि सीमान ने पेरियार-विरोधी रुख अपनाया है। राजनीतिक विश्लेषक अय्यनाथन ने कहा, “RSS से जुड़े एक कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए, उन्होंने कहा था कि वह 'द्रविड़ दीवार' को 'ब्राह्मण कडाप्परई' (सब्बल) से तोड़ देंगे। वे अपने राजनीतिक संदेशों में जाति और पहचान का खुलकर इस्तेमाल करते रहे हैं।”
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