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मोदी सरकार ने उठाए ये क़दम फिर भी क्यों नहीं थम रहीं चीनी की क़ीमतें

Updated on 25-08-2026 07:03 PM
भारत दुनिया भर में चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है. भारत में चीनी की क़ीमतें पिछले दो महीनों में 40 फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई हैं.

चीनी कंपनियों के शेयरों में सोमवार के इंट्राडे कारोबार में 12 फ़ीसदी तक की तेज़ी आई. यह तेज़ी इस उम्मीद के बीच आई कि शुगर सेक्टर के आउटलुक में सुधार होगा.

बजाज हिंदुस्तान शुगर, अवध शुगर एंड एनर्जी, डालमिया भारत शुगर एंड इंडस्ट्रीज, धामपुर शुगर मिल्स, द्वारिकेश शुगर इंडस्ट्रीज, मगध शुगर एंड एनर्जी, मवाना शुगर्स, पोन्नी शुगर्स (ईरोड), उगर शुगर वर्क्स और उत्तम शुगर मिल्स के शेयरों ने इंट्राडे कारोबार में अपने-अपने 52 हफ़्ते के उच्चतम स्तर को छुआ.

भारत ने क़रीब एक दशक में पहली बार 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी फ़्री आयात की अनुमति दी है. यानी भारत विदेशों से चीनी बिना आयात शुल्क के मंगवा रहा है ताकि क़ीमतों को नियंत्रित रखा जाए.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ राज्यों में चीनी की क़ीमतों में बढ़ोतरी 50 फ़ीसदी तक पहुँच गई है. उत्तराखंड, पंजाब, मध्य प्रदेश और ओडिशा समेत आठ राज्यों में चीनी की क़ीमत 65 रुपये प्रति किलोग्राम से ऊपर पहुँच गई है.

23 अगस्त को ओडिशा में चीनी की क़ीमत सबसे ज़्यादा 67.4 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई. एक सप्ताह पहले यह 55 रुपये, एक महीने पहले 50.78 रुपये और 23 अगस्त, 2025 को 46.89 रुपये प्रति किलोग्राम थी.

भारत में चीनी लंबे समय से राजनीतिक रूप से संवेदनशील उत्पाद रही है, क्योंकि इसका असर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों पर पड़ता है.

पंजाब और उत्तर प्रदेश में अगले आठ महीनों के भीतर विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में चीनी आयात करने के फ़ैसले ने भी राजनीतिक रंग ले लिया है.

पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी समेत प्रमुख विपक्षी दल केंद्र सरकार के इतने लंबे अंतराल के बाद चीनी आयात की अनुमति देने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आए हैं.

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नज़दीक होने के कारण सरकार के लिए अधिक आयात या इथेनॉल के लिए चीनी के डायवर्ज़न को कम करके चीनी की क़ीमतों को नीचे लाने की एक सीमा है.

वरना अक्तूबर से शुरू होने वाले 2026-27 के सीजन में गन्ने का बकाया भुगतान बढ़ना शुरू हो सकता है.

शुगर इंडस्ट्री के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ''इंडस्ट्री के नज़रिए से देखें तो क़रीब 50 रुपये प्रति किलोग्राम की क़ीमत सकारात्मक होगी. चीनी की उत्पादन लागत क़रीब 42-43 रुपये प्रति किलोग्राम रहने का अनुमान है. पिछले कुछ वर्षों में कई मामलों में मिलों ने उत्पादन लागत से कम क़ीमत पर चीनी बेची है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ा है.''

''इसलिए, मिल से निकलने वाली चीनी की क़ीमत अगर लगातार क़रीब 50 रुपये प्रति किलोग्राम बनी रहती है, तो इससे चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति सुधारने में मदद मिलेगी. पिछले कुछ वर्षों से मिलों को लगातार ऐसी स्थिति हासिल करने में मुश्किल हो रही है."

सरकार क़ीमतें क्यों नहीं कंट्रोल कर पा रही है?
शुगर सेक्टर में एक संतुलन की बात अक्सर की जाती है. उपभोक्ता, किसान और मिल मालिक. उपभोक्ता चाहता है कि उसे सस्ती चीनी मिले, किसान चाहता है कि गन्ने की ऊंची क़ीमत उसे मिले और मिल मालिक चाहते हैं कि उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा हो.

अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर अरुण कुमार बताते हैं कि सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि इन तीनों (उपभोक्ता, किसान और मिल मालिक) के बीच संतुलन बनाए रखे लेकिन ऐसा इस बार होता नहीं दिख रहा है.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, ''सरकार ने जो क़दम उठाए हैं, उनका असर अभी नहीं होगा क्योंकि स्थिति जब बेकाबू हो गई, तब क़दम उठाए गए हैं. सरकार ने चीनी का निर्यात क्यों होने दिया, इथेनॉल के लिए चीनी क्यों डायवर्ट की गई? इन सवालों के जवाब सरकार के पास नहीं हैं.''

केंद्र सरकार ने एक अगस्त से 30 नवंबर तक देशभर के चीनी डीलरों पर 400 टन की स्टॉक सीमा भी लागू की है. वहीं, एक सितंबर से थोक उपभोक्ताओं को 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी.

लेकिन प्रोफ़ेसर अरुण कुमार मानते हैं कि ''इसका असर तत्काल नहीं दिखेगा. क़ीमतें स्थिर होने में कम से कम दो महीने लग सकते हैं.''

चीनी क्यों महंगी हो रही है?

इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (आईएसएमए) के अध्यक्ष नीरज शिरगांवकर ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बताया कि, "चीनी का स्टॉक और आपूर्ति पर्याप्त है और त्योहारों के दौरान बढ़ी हुई मांग को पूरा करने में कोई समस्या नहीं होगी."

भारत में अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहारों के दौरान चीनी की मांग आम तौर पर बढ़ जाती है. इस दौरान पारंपरिक मिठाइयों और कन्फेक्शनरी की खपत बढ़ती है.

शिरगांवकर ने कहा कि चीनी की कोई भी कमी कृत्रिम है और सट्टेबाजी के कारण पैदा हुई है. सरकार की ओर से 10 लाख टन चीनी के आयात की अनुमति जैसे क़दम बाज़ार में चिंता कम करने के मक़सद से उठाए गए हैं.

उन्होंने बताया कि 30 सितंबर को समाप्त होने वाले मार्केटिंग वर्ष में भारत ने 2.79 करोड़ टन चीनी का उत्पादन किया. यह सालाना 2.8 करोड़ से 2.85 करोड़ टन की खपत से थोड़ा कम है, लेकिन पिछले साल के 2.61 करोड़ टन उत्पादन से अधिक है.

उन्होंने कहा कि चीनी मिलों ने क़रीब 30 लाख टन चीनी को इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किया है और इस साल क़रीब आठ लाख टन चीनी का निर्यात किया गया है. सरकार ने कुल 20 लाख टन निर्यात की अनुमति दी थी.

उन्होंने बताया कि भारत नए मार्केटिंग वर्ष की शुरुआत क़रीब 35 लाख टन के शुरुआती स्टॉक के साथ करेगा, जो एक साल पहले के 50 लाख टन के मुक़ाबले कम है.

विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठा रही हैं लेकिन अभी तक सरकार को क़ीमतें नियंत्रित करने में कामयाबी नहीं मिली है.

विपक्ष इथेनॉल बनाने के लिए चीनी को डायवर्ट किए जाने को क़ीमतों में तेज़ बढ़ोतरी की वजह बता रहा है. वहीं, किसान संगठनों ने आरोप लगाया कि त्योहारों के मौसम से पहले बड़े व्यापारियों ने चीनी की क़ीमतों में कृत्रिम बढ़ोतरी की है.

सरकार ने अपने जवाब में कहा कि वह स्थिति पर क़रीबी नज़र रख रही है. सरकार के मुताबिक़, चीनी की क़ीमतें बढ़ने के पीछे कई कारण हैं, जिनमें घरेलू उत्पादन का अनुमान से कम रहना, त्योहारों से पहले मांग में बढ़ोतरी, मौसम के कारण गन्ने की फसल को नुक़सान, वैश्विक स्तर पर चीनी की आपूर्ति कम होने के साथ सट्टेबाज़ी और जमाखोरी शामिल हैं.

केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने 31 अक्तूबर, 2026 तक 10 लाख टन चीनी के आयात की अनुमति देते हुए अधिसूचना जारी की है.

23 अगस्त, 2025 को देश भर में चीनी की औसत खुदरा क़ीमत 46.30 रुपये प्रति किलोग्राम थी. लेकिन 23 अगस्त, 2026 को यह बढ़कर 62.47 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई, यानी एक साल में 34.92 फीसदी की बढ़ोतरी.

इस साल 23 जुलाई को चीनी की कीमत 48.62 रुपये प्रति किलोग्राम थी. यानी केवल 30 दिनों में कीमत 28.49 फ़ीसदी बढ़ गई. 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक साल में चीनी की कीमत 40 से 50 फ़ीसदी तक बढ़ी है.


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