शी जिनपिंग के दौरे की चीन पुष्टि क्यों नहीं कर रहा, क्या भारत ने अपनी अहम मांग छोड़ दी
Updated on
10-09-2026 02:54 PM
भारत में 2023 में 9-10 सितंबर को जी-20 समिट हुआ था. इस समिट में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शामिल नहीं हुए थे. लेकिन तब उनके शामिल होने को लेकर अंतिम पलों तक कोई अटकलें नहीं थीं.
चीन ने क़रीब एक हफ़्ता पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि शी जिनपिंग जी-20 समिट में शामिल होने नई दिल्ली नहीं जाएंगे.
अब इसी हफ़्ते नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को ब्रिक्स समिट है लेकिन चीन ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दौरे की पुष्टि नहीं की है.
चीन के विदेश मंत्रालय ने बुधवार शाम तक कहा कि अभी इसे लेकर कोई जानकारी नहीं है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी यही बात कही है.
कई लोग हैरानी जता रहे हैं कि चीन आख़िर कन्फ़र्म क्यों नहीं कर रहा है. थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान ने एक्स पर लिखा है, ''चीन ने किर्गिस्तान में एससीओ समिट के लिए शी जिनपिंग की यात्रा की घोषणा 26 अगस्त को की थी. यानी उनके रवाना होने से क़रीब चार दिन पहले. मुझे नहीं पता कि यह प्रोटोकॉल से जुड़ी कोई बात है या फिर इसके पीछे कोई और वजह है, जैसे कि चीन भारत की ओर से पहले घोषणा किए जाने का इंतज़ार कर रहा हो.''
रक्षा विश्लेषक प्रवीण साहनी भी चीन के रुख़ से हैरान हैं. उन्होंने एक्स पर लिखा है, ''चीन के लिए यह असामान्य है. अभी तक यह घोषणा नहीं कर रहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे या नहीं.''
''समिट अब सिर्फ़ दो दिन दूर है. ऐसा लगता है कि 2023 के जी20 की तरह इस बार भी चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व प्रधानमंत्री ली चियांग कर सकते हैं. अगर शी जिनपिंग नहीं आते हैं, तो यह ब्रिक्स में भारत की भूमिका के लिए एक बड़ा झटका होगा.''
हालांकि इंडियाज चाइना चैलेंज के लेखक अनंत कृष्णन इसे बहुत असामान्य नहीं मान रहे हैं. कृष्णन ने लिखा है, ''बुधवार को भी चीन के विदेश मंत्रालय से पुष्टि नहीं होना अपने आप में किसी ख़ास बात का संकेत नहीं है. चीन के लिए किसी यात्रा से दो दिन पहले उसकी घोषणा करना असामान्य नहीं है और आमतौर पर यही प्रोटोकॉल अपनाया जाता है. कोई बड़ा द्विपक्षीय राजकीय दौरा होता तब उसकी घोषणा तीन-चार दिन पहले की जा सकती है.''
भारत का बदला रुख़
अगर शी जिनपिंग ब्रिक्स समिट में आते हैं तो यह क़रीब सात साल में उनकी पहली भारत यात्रा होगी. ब्रिक्स में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और सात अन्य देश शामिल हैं.
ब्रिक्स को अमेरिकी दबदबे वाली दुनिया के विकल्प के रूप देखा जाता है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार धमकी दे चुके हैं.
दोनों देशों के बीच जून 2020 में क़रीब 2,200 मील लंबी सीमा पर हुई झड़पों में 20 भारतीय सैनिकों और कम से कम चार चीनी सैनिकों की मौत हुई थी, जिसके बाद दोनों देशों के रिश्ते बुरी तरह प्रभावित हुए थे.
दोनों देशों के पास संबंधों को स्थिर करने की कई अच्छी वजहें हैं. इनमें भारत के मामले में राष्ट्रपति ट्रंप की अनिश्चित विदेश नीति को लेकर चिंता भी शामिल है.
अमेरिका में काउंसिल फॉरन रिलेशन्स के सीनियर फेलो सदानंद धुमे ने वाल स्ट्रीट जर्नल में लिखा है, ''रिश्तों को पूरी तरह सामान्य करने के लिए कोई जादुई रीसेट बटन नहीं है. भारत और चीन के बीच मतभेदों की कई वजहें हैं. इनमें एक-दूसरे के साथ टकराते सीमाई दावे, कथित ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों का नेतृत्व करने की होड़ और पाकिस्तान के साथ चीन की क़रीबी साझेदारी को लेकर गहरे मतभेद हैं. ऐसे में वास्तविक मेल-मिलाप आसान नहीं है.''
चीन में भारत के पूर्व राजदूत गौतम बंबावले भारत-चीन संबंधों में रीसेट की बात को जल्दबाज़ी मानते हैं. बंबावले ने सदानंद धुमे से कहा, ''2020 की झड़पों ने "रिश्तों को 10 क़दम पीछे धकेल दिया जबकि हाल में रिश्तों में नरमी के संकेत "ज़्यादा से ज़्यादा तीन क़दम आगे बढ़ने" का संकेत देते हैं.''
2020 की हिंसा के बाद भारत ने सीमा पर हज़ारों सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी थी, टिकटॉक और वीचैट समेत क़रीब 60 चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया, ख़्वावे और ज़ेडटीई जैसी चीनी कंपनियों को भारत के 5G टेलीकॉम नेटवर्क के विस्तार में प्रभावी रूप से बाहर कर दिया, चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीज़ा निलंबित कर दिए और अमेरिका, जापान के अलावा ऑस्ट्रेलिया वाले क्वॉड समूह के साथ सहयोग और गहरा किया.
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