चीन लंबे युद्ध की तैयारी में जुटा, देश में लागू किया नया कानून, जंग छिड़ते ही टेक कंपनियों पर होगा PLA का कंट्रोल
Updated on
31-08-2026 08:37 PM
चीन ने उस कानून को लागू कर दिया है जिसके तहत जंग छिड़ते ही देश की संभी टेक कंपनियों पर सेना का कंट्रोल हो जाएगा। इस कानून को उसकी लंबे समय तक युद्ध लड़ने की रणनीति ते तहत देखा जा रहा है। चीन ने एक बेहद सख्त 'वॉर लॉ' पास किया है। इस नए कानून के लागू होते ही युद्ध की स्थिति में देश की पूरी तकनीक, प्राइवेट संसाधन और यहां तक कि आम लोग भी सीधे पीएलए के नियंत्रण में होंगे।
चीन ने नेशनल डिफेंस मोबिलाइजेशन फ्रेमवर्क में बड़ा बदलाव कर दिया है। इसके तहत युद्ध के समय होने वाले कामों में आम नागरिकों, प्राइवेट कंपनियों, टेक्नोलॉजी फर्मों, इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक संसाधनों को शामिल करने की कानूनी व्यवस्था बनाई गई है। चीन की शीर्ष विधायिका ने 28 अगस्त को संशोधित 'नेशनल डिफेंस मोबिलाइजेशन लॉ' को मंजूरी दी है जो 1 अक्टूबर से लागू होगा।
चीन का नया युद्ध कानून क्या है?
रिपोर्ट के मुताबिक इस बड़े बदलाव के साथ ही बीजिंग के लिए युद्ध के समय का एक नया ब्लूप्रिंट तैयार हो गया है। इससे देश की नागरिक जनशक्ति, टेक्नोलॉजी और आर्थिक क्षमता का इस्तेमाल करके सरकार शांति के समय से तेजी से बड़े पैमाने पर लामबंदी की स्थिति में आ सकेगी। यह कानून 2010 के बाद चीन के राष्ट्रीय रक्षा लामबंदी ढांचे में पहला बड़ा बदलाव है और इसमें 14 अध्याय और 82 अनुच्छेद शामिल हैं।
नागरिकों की अनिवार्य सेवा- इस नए कानून के तहत युद्ध या राष्ट्रीय सुरक्षा संकट के दौरान 18 से 60 वर्ष की आयु के पुरुषों और 18 से 55 वर्ष की आयु की महिलाओं को राष्ट्रीय रक्षा और लॉजिस्टिक्स से जुड़े कार्य करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। इसका मतलब है कि आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा युद्ध के समय मदद करने के कानूनी दायरे में आ जाएगा।
टेक सेक्टर और संसाधनों का अधिग्रहण- इसके जरिए चीनी सेना को देश के निजी तकनीकी क्षेत्र, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन, साइबर युद्ध क्षमताओं और अन्य नागरिक बुनियादी ढांचे और संपत्तियों को युद्धकालीन जरूरतों के लिए उपयोग में लेने का कानूनी अधिकार मिल गया है।
नागरिक संसाधनों का इस्तेमाल- सेना की जरूरत के हिसाब से आम नागरिकों की गाड़ियों, उपकरणों, सुविधाओं, इमारतों और उनकी अन्य संपत्तियों को जब्त या इस्तेमाल किया जा सकता है।
इनकार करने पर कार्रवाई- जो लोग या संगठन रक्षा-तैयारी से जुड़े कामों को करने से मना करते हैं या उनमें देरी करते हैं उन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
बीजिंग के इस संशोधित कानून में खास तौर पर कहा गया है कि राष्ट्रीय रक्षा की तैयारी में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाए और उभरते हुए क्षेत्रों में तैयारी की क्षमताएं विकसित की जाएं। इस ढांचे में डेटा, साइबर सिक्योरिटी, मिलिट्री रिसर्च, प्रोडक्शन और लॉजिस्टिकल सपोर्ट से जुड़ी जिम्मेदारियों का दायरा भी बढ़ाया गया है।
चीन का सबसे ज्यादा फोकस टेक कंपनियों पर क्यों है?
इसका बहुत साधी जवाब है डुएल टेक्नोलॉजी यानि दोहरे इस्तेमाल वाली टेक्नोलॉजी। इससे नागरिकों की टेक्नोलॉजी क्षमताएं 'पीपल्स लिबरेशन आर्मी' की युद्ध के समय की जरूरतों के और करीब आ जाती हैं। AI, ड्रोन, साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सिस्टम समेत ज्यादातर टेक्नोलॉजी का निर्माण चीन ने दो मकसदों के साथ किया है। जरूरत के मुताबिक नागरिक इस्तेमाल के लिए और जरूरत हो तो सैन्य इस्तेमाल के लिए। इसीलिए युद्ध के समय तमाम टेक कंपनियों पर सीधे पीएलए का कब्जा हो जाएगा।
चीन के नये कानून से भारत पर क्या संभावित असर होगा?
न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक इसका असर भारत की रणनीतिक सोच पर भी पड़ेगा। आम नागरिकों के लॉजिस्टिक्स, टेक्नोलॉजी, इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई-चेन क्षमता का तेजी से इस्तेमाल करने की क्षमता चीन को विवादित इलाकों जैसे LAC पर लंबे समय तक सैन्य दबाव बनाए रखने में मदद कर सकती है। इसलिए यह बदला हुआ कानून सिर्फ सेना में लोगों की संख्या बढ़ाने के बारे में नहीं है। यह चीनी समाज, टेक्नोलॉजी और अर्थव्यवस्था को युद्ध के समय के हिसाब से एक साथ लाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव है।
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