नेपाल में आई बाढ़ से भारत को क्यों चिंता होनी चाहिए?
Updated on
03-09-2026 09:22 PM
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक ऐसे ख़तरे को उजागर किया है, जो उसकी सीमाओं पर ही नहीं रुकता.
भारत और नेपाल हिमालय से निकलने वाली नदियों को साझा करते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल में बाढ़ और भारत में आपदा के बीच का संबंध पानी के बहाव की एक आसान कहानी से कहीं ज़्यादा जटिल है.
कुछ बाढ़ पहाड़ों से तेज़ी से निकलकर अपने साथ भारी मात्रा में कीचड़, पत्थर और मलबा बहा ले जाती है. वहीं, कुछ बाढ़ मैदानों तक पहुँचते-पहुँचते अपनी शक्ति खो देती हैं, जिससे एक सामान्य बाढ़ का रूप ही रह जाता है.
क्या वह पानी भारत में आपदा का कारण बनेगा, यह न केवल नेपाल में हुई बारिश की मात्रा पर निर्भर करता है, बल्कि भारत में वर्षा, नदी के जल स्तर, तटबंधों, जल निकासी और विकास पर भी निर्भर करता है.
नेपाल में आई बाढ़ भारत के लिए एक चेतावनी है. न केवल इसलिए कि पानी सीमा पार दक्षिण की ओर बहता है, बल्कि इसलिए भी कि दोनों देश एक विशाल और तेज़ी से अस्थिर होती हिमालयी नदी व्यवस्था को साझा करते हैं.
नेपाल में 6,000 से ज़्यादा नदियां हैं, जिनमें से अधिकांश दक्षिण की ओर बहकर भारत और गंगा में मिल जाती हैं.
यहाँ तीन प्रमुख जल व्यवस्था प्रभावी हैं. पूरब में कोसी, मध्य में गंडकी (भारत में गंडक) और पश्चिम में करनाली (भारत में घाघरा), जबकि पश्चिमी सीमा के साथ महाकाली (शारदा) नदी स्थित है.
शिवालिक और चुरे पर्वतमाला से निकलने वाली एक दर्जन छोटी नदियाँ, जिनमें बागमती, कमला, राप्ती और बाबई शामिल हैं, वो अपने छोटे और ढलान वाले जलग्रहण क्षेत्रों के कारण अप्रत्याशित बाढ़ ला सकती हैं.
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के जलविज्ञानी मनीष श्रेष्ठ के अनुसार, नेपाल से सात से नौ प्रमुख नदियां भारतीय मैदानों में बहती हैं और ये नदियां भारत में बाढ़ के लिए ज़िम्मेदार हैं.
भारत के केंद्रीय जल आयोग ने कोसी, गंडक, बागमती और घाघरा को कुछ प्रमुख सीमा पार नदियों के रूप में पहचाना है.
भारत के कौन से राज्य सबसे ज़्यादा जोखिम में हैं?
बिहार भारत का सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य है, जहाँ उत्तरी बिहार का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा आधिकारिक तौर पर बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है.
राज्य में बाढ़ लाने वाली लगभग सभी प्रमुख नदियाँ नेपाल से निकलती हैं, जिनमें कोसी सबसे कुख्यात है. उसे "बिहार का शोक" कहा जाता है. उसके बाद गंडक, बागमती और कमला नदियां आती हैं.
लेकिन यह ख़तरा बिहार तक ही सीमित नहीं है.
पूर्वी उत्तर प्रदेश घाघरा, राप्ती और गंडक नदियों की चपेट में है. गोरखपुर,बहराइच,लखीमपुर खीरी और श्रावस्ती जैसे ज़िले नियमित रूप से प्रभावित होते हैं.
उत्तराखंड राज्य महाकाली-शारदा नदियों को साझा करता है. उत्तरी बंगाल को मेची और महानंदा मिलती है.
आईसीआईएमओडी के जलविज्ञानी प्रदीप मान डांगोल कहते हैं, "संख्या के मामले में बिहार का दबदबा है. उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है और अक्सर इसकी रिपोर्टिंग कम होती है,"
बिहार पर सबसे अधिक बोझ है, लेकिन उत्तर प्रदेश भी इस जोखिम का एक अहम और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला हिस्सा है.
जब नेपाल में बाढ़ आएगी, तो भारत का भाग्य कौन तय करेगा?
जलविज्ञानी कहते हैं, इसे तीन भागों वाली श्रृंखला के रूप में सोचें.
सबसे पहले, बारिश: यह कहाँ होती है और कितनी तेज़ होती है.
भारत तक पहुँचने वाली बाढ़ की चोटियाँ अक्सर ऊंचे हिमालय में नहीं बल्कि निचले इलाक़ों में शिवालिक, चुरे और तराई में उत्पन्न होती हैं, जहाँ खड़ी ढलानों वाले छोटे जलग्रहण क्षेत्रों पर तीव्र मॉनसूनी बारिश हो सकती है.
दूसरा, नदी.
नेपाल की नदियां पर्वतीय मोर्चे पर ढलान के एक तीव्र विभाजन को पार करती हैं, अपना तलछट गिराती हैं, और मैदानों में गुंथी हुई, बदलती धाराओं के रूप में फैल जाती हैं.
तीसरा, जब पानी भारत से मिलता है.
बाढ़ कितनी भयावह होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि पानी को किन-किन चीज़ों का सामना करना पड़ता है. भारतीय हिस्से में हुई बारिश की मात्रा, गंगा में पानी का स्तर, तटबंध और बैराज, बाढ़ के मैदान पर स्थित सड़कों, रेलवे और बस्तियों से अवरुद्ध जल निकासी व्यवस्था.
इसलिए सीमा पर जल प्रवाह की अधिकतम मात्रा काफी हद तक नेपाल में होने वाली वर्षा पर निर्भर करती है. बाढ़ की तीव्रता कम से कम उतनी ही हद तक भारत की स्थितियों पर भी निर्भर करती है.
2008 की कोसी आपदा से यह स्पष्ट हो गया कि नदी में तटबंध की क्षमता से कहीं कम जल प्रवाह था. यह आपदा किसी असाधारण बाढ़ के कारण नहीं, बल्कि तटबंध के टूटने के कारण हुई थी.
इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के शाश्वत सान्याल कहते हैं कि सीमा पर पहुँचने वाले अधिकतम जल प्रवाह के लिए मुख्य रूप से नेपाल की वर्षा ज़िम्मेदार है. लेकिन एक बार पहुँचने के बाद बाढ़ की गंभीरता के लिए कम से कम उतनी ही हद तक भारतीय परिस्थितियां भी ज़िम्मेदार हैं.
नेपाल की बारिश भारत में बाढ़ का ख़तरा कैसे बन सकती है?
2008 की कोसी आपदा इसका एक सशक्त उदाहरण है.
नेपाल में कोसी नदी के तटबंध टूटने के बाद बिहार में लगभग 400 लोगों की मौत हो गई. लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से, यह नदी में असामान्य रूप से तेज़ बहाव की घटना नहीं थी.
कानपुर आईआईटी में जियोलॉजी के प्रोफ़ेसर राजीव सिन्हा के अनुसार, नदी का जल प्रवाह उसकी वहन क्षमता का लगभग दसवां हिस्सा ही था. यह आपदा दशकों पहले बने और अपर्याप्त रखरखाव वाले तटबंध में दरार के कारण हुई थी.
सिन्हा कहते हैं, "1950 और 1960 के दशक में बनाए गए तटबंधों का ठीक से रखरखाव नहीं किया गया था. वे कट-फट गए थे और अंततः उनमें एक कमज़ोर बिंदु विकसित हो गया. नदी ने इन्हीं कमज़ोर बिंदुओं से तटबंध को तोड़ दिया और भारत के उन हिस्सों में प्रवेश कर गई, जहाँ शायद 100 वर्षों से बाढ़ नहीं आई थी."
सान्याल कहते हैं कि यह विफलता स्ट्रक्चरल थी.
नेपाल से भारत को कितनी चेतावनी मिल सकती है?
सान्याल के अनुसार, सामान्य मॉनसून की बाढ़ के लिए, भारत को "लगभग 12 घंटे से लेकर दो दिन तक की चेतावनी मिल सकती है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि पानी कितनी तेज़ी से नीचे की ओर बहता है.
कोसी और गंडक नदियों के रास्ते नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र से बिहार के मैदानी इलाक़ों तक पानी पहुंचने में लगभग एक दिन लग सकता है और घाघरा नदी के रास्ते इसमें थोड़ा अधिक समय लग सकता है.
चुरे नदी से आने वाली अचानक बाढ़ कुछ ही घंटों में आ सकती है.
भूस्खलन, बांध टूटना या मलबा प्रवाह जैसी घटनाएं और भी तेज़ हो सकती हैं. मौजूदा बाढ़ में, रसुवा से उठने वाली अधिकतम जलधारा लगभग साढ़े सात घंटे में भारतीय सीमा के पास त्रिवेनी तक पहुँच गई.
भारत और नेपाल स्टेशनों के एक नेटवर्क से रियल टाइम में वर्षा और नदी जलस्तर के आंकड़े साझा करते हैं. नेपाल का जल विज्ञान और मौसम विज्ञान विभाग भारत के केंद्रीय जल आयोग को वर्षा और नदी जलस्तर के आंकड़े भेजता है, जिसका उपयोग बाढ़ पूर्वानुमान के लिए किया जाता है.
लेकिन सान्याल कहते हैं कि महत्वपूर्ण कमियां अब भी मौजूद हैं,
इनमें चुरे नदी के सबसे तेज़ बहाव वाले जलक्षेत्रों में वास्तविक समय की निगरानी करने वाले स्टेशनों की संख्या बहुत कम है.
साथ ही, दोनों देशों के बीच कोई एक साझा पूर्वानुमान मॉडल भी नहीं है; और तटबंधों की स्थिति, नदी के मार्ग में परिवर्तन और तलछट के बारे में नियमित रूप से जानकारी साझा करने का स्तर भी सीमित है.
और फिर, सबसे महत्वपूर्ण बात, आख़िरी पड़ाव आता है.
किसी ज़िला कार्यालय तक चेतावनी पहुंचना और किसी ख़तरे में पड़े परिवार तक चेतावनी पहुँचना एक ही बात नहीं है.
सिन्हा कहते हैं कि इन सीमा पार नदियों के लिए, "सूचना साझा करने और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों पर सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है. हिमनदी झीलों, उनके बहाव और समय के साथ उनमें हो रहे परिवर्तनों की त्वरित और निरंतर निगरानी की ज़रूरत है."
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