'बांग्लादेश क्या भारत से युद्ध लड़ेगा?', बांग्लादेशी एक्सपर्ट ने मुस्लिम नाटो से दूर रहने के 5 कारण बताए
Updated on
28-08-2026 01:15 PM
बांग्लादेश की सियासत और आम लोगों के बीच एक बहस जो सबसे ज्यादा है वो ये कि क्या देश को पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की वाले 'इस्लामिक नाटो' में शामिल होना चाहिए? बांग्लादेशी एक्सपर्ट मो. शरीफुल इस्लाम जो राजशाही यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशंस पढ़ाते हैं उन्होंने कहा है कि किसी देश को विदेश नीति से जुड़े फैसले भावनाओं के बजाय तथ्यों और सावधानीपूर्वक किए गए विश्लेषण के आधार पर लेने चाहिए। इसके पीछे उन्होंने 'रैशनल एक्टर मॉडल' का हवाला दिया है और भावनाओं के बजाए तर्क के आधार पर फैसला लेने की अपील की है।
उन्होंने लिखा है कि बांग्लादेश को 'मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' में शामिल होने का फैसला करने से पहले इसी तरह सावधानीपूर्वक आकलन करना चाहिए। इस नजरिए से देखें तो कई ठोस कारण हैं जिनकी वजह से इस समझौते में शामिल होना बांग्लादेश के सर्वोत्तम हित में नहीं हो सकता है। उन्होंने पांच ऐसे वजहों का जिक्र किया है और तारिक रहमान की सरकार को सलाह दी है कि बांग्लादेश को 'मक्का पैक्ट' में शामिल नहीं होना चाहिए
पहला कारण- बांग्लादेश को किस देश से खतरा है?
मो. शरीफुल इस्लाम ने द डेली स्टार में लिखे लेख में पूछा है कि किसी रक्षा समझौते में शामिल होने का सबसे पहला आधार होता है किसी दुश्मन का होना। जब उन्हें गंभीर बाहरी सुरक्षा खतरों खासकर सैन्य खतरों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान दलील दे सकता है कि उसे भारत और अफगानिस्तान से खतरा है, इसी तरह सऊदी अरब भी इजरायल और मिडिल ईस्ट के हालात का हवाला दे सकता है जबकि तुर्की के लिए भी इजरायल और भूमध्यसागर के देश खतरे की तरह दिख सकते हैं लेकिन बांग्लादेश के सामने क्या खतरा है?
दूसरा कारण- क्या भारत से युद्ध लड़ेगा बांग्लादेश?
उन्होंने मक्का समझौते से दूर रहने की दूसरी वजह का हवाला देते हुए लिखा है कि इस्लामिक नाटो कहता है कि एक देश पर हमला सभी देशों पर हमला होगा। तो क्या अगर भविष्य में भारत और पाकिस्तान किसी संघर्ष में फंसते हैं तो क्या बांग्लादेश भारत से युद्ध लड़ेगा? पाकिस्तान बांग्लादेश पर युद्ध में शामिल होने का दबाव बनाएगा। लेकिन बांग्लादेश ऐसी जिम्मेदारी क्यों ले? बेशक भारत के साथ बांग्लादेश के कई अनसुलझे मुद्दे हैं जैसे पानी का बंटवारा, व्यापार और सीमा से जुड़ी चुनौतियां। लेकिन इन समस्याओं को सैन्य टकराव से हल नहीं किया जा सकता। इनके लिए लगातार कूटनीति की जरूरत है जैसा कि समुद्री सीमा विवाद और जमीनी सीमा समझौते के सफल समाधान से साबित हुआ है।
तीसरा कारण- मध्य पूर्व में बांग्लादेश को चाहिए संतुलित नीति
उन्होंने तीसरा कारण गिनाते हुए लिखा है कि सऊदी अरब बांग्लादेशी प्रवासी कामगारों के लिए एक अहम जगह है लेकिन UAE, ओमान, कतर और कुवैत भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए खाड़ी देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए रखना बांग्लादेश के आर्थिक और श्रम संबंधी हितों के लिए बहुत जरूरी है। इनमें से कुछ देशों के इस समझौते के सदस्यों के साथ अपने राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद हैं और समझौते में शामिल होने का बांग्लादेश का फ़ैसला उनके साथ उसके रिश्तों को मुश्किल में डाल सकता है।
चौथा कारण- ईरान से बांग्लादेश के रिश्ते
उन्होंने चौथा कारण होर्मुज स्ट्रेट को बताया है। मो. शरीफुल इस्लाम ने लिखा है कि वैश्विक व्यापार और वाणिज्य के लिए होर्मुज स्ट्रेट एक अहम समुद्री मार्ग है। अगर बांग्लादेश इस समझौते में शामिल होता है और ईरान और समझौते के सदस्यों के बीच तनाव बढ़ता है तो ईरान इस जलडमरूमध्य से बांग्लादेशी मालवाहक जहाजों के गुजरने पर रोक लगा सकता है। ऐसी स्थिति बांग्लादेश के लिए खासकर उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
पांचवां कारण- आर्थिक हितों पर होगा गंभीर असर
मो. शरीफुल इस्लाम ने आगाह करते हुए लिखा है कि अपनी मौजूदा आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को देखते हुए बांग्लादेश युद्ध में शामिल होने का जोखिम नहीं उठा सकता। उसके लिए भोजन, स्वास्थ्य, आर्थिक और पर्यावरण की सुरक्षा जरूरी है। ऐसा कोई भी सैन्य समझौता उसे हर एक क्षेत्र में गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे समझौते में शामिल होने पर बांग्लादेश पर इन देशों के संघर्ष में शामिल होने का बार बार दबाव बनेगा और इनमें से एक भी युद्ध बांग्लादेश का अपना नहीं होगा।
बांग्लादेश पर ऐसे संघर्षों में किसी एक पक्ष का साथ देने का दबाव बन सकता है जिनका उसकी अपनी सुरक्षा से शायद ही कोई लेना-देना हो। युद्ध में किसी भी तरह की भागीदारी का खामियाजा आखिरकार आम लोगों को ही भुगतना पड़ेगा क्योंकि विकास और जरूरी सार्वजनिक सेवाओं के लिए सीमित राष्ट्रीय संसाधनों को सैन्य खर्च की ओर मोड़ना पड़ेगा। युद्ध हमेशा देशों और उनके नागरिकों के लिए महंगा साबित होता है भले ही इससे हथियार और ऊर्जा कंपनियों को मुनाफा हो सकता है।
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