जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही हिरासत, कॉकरोच जनता पार्टी की रणनीति पर क्या बोले विशेषज्ञ
Updated on
11-10-2026 03:24 PM
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की कॉल पर दस अक्तूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंचने की कोशिश करने वाले तमाम प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया गया.
खुद सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके दोनों प्रमुख सहयोगी आशुतोष रांका और सौरव दास को पुलिस ने दिल्ली में कदम रखने से पहले ही विमान के अंदर जाकर हिरासत में ले लिया.
इस पूरे घटनाक्रम के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए और समर्थकों ने दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई को अभूतपूर्व बताकर इसकी आलोचना भी की.
दूसरी ओर सीजेपी की रणनीति पर भी लोगों ने सवाल उठाए, जिसमें पूछा गया कि आख़िर उन्होंने दिल्ली आने से जुड़ी अपनी पूरी योजना सार्वजनिक क्यों कर दी?
सोशल मीडिया पर लोग सीजेपी और आइसा की नेहा बोरा की रणनीति की तुलना करने लगे, जिन्होंने कथित रूप से अपनी लोकेशन गोपनीय रखी. शनिवार दोपहर वे दिल्ली हाट पहुंच गईं, जहाँ उनके साथ योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण भी मौजूद थे. इन सभी को वहाँ प्रदर्शन करते हुए डिटेन कर लिया गया.
इतना ही नहीं, सौरव दास के तीन अक्तूबर के उस बयान की चर्चा भी शुरू हो गई, जिसमें उन्होंने कहा था "अगर आपको पहुँचते ही हिरासत में ले लिया गया, तो आपको अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने की ज़रूरत है. अपनी नाकामियों के लिए दूसरों को दोष मत दीजिए."
उनका यह बयान तब कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने के संदर्भ में आया था.
'सरकार के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आना रणनीति'
सीजेपी के दस अक्तूबर के "दिल्ली चलो" कॉल और पुलिस हिरासत से बचने से जुड़ी रणनीति को लेकर वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात की.
उनका कहना है कि भले सीजेपी की रणनीति पर सवाल उठाए जा रहे हों, मगर वे लोग जानते थे कि जब सरकार किसी संभावित सामान्य प्रदर्शनकारी तक को दिल्ली पहुंचने से पहले ही डिटेन कर ले रही है, तो उनकी निगरानी तो की ही जा रही होगी. ऐसे में अपनी लोकेशन को गोपनीय रखना न तो ज़रूरी था और न ही आसान.
वे कहते हैं, "सीजेपी जानती है कि सरकार उन्हें जितना दबाएगी, उतना ही उन्हें फ़ायदा मिलेगा."
दूसरी ओर, दैनिक भास्कर समूह के पूर्व राजनीतिक संपादक रहे हेमंत अत्री मानते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी की रणनीति से कुछ सवाल तो लीडरशिप पर ज़रूर उठे हैं, मगर वे यह भी कहते हैं कि आंदोलन अभी शुरू ही हुआ है, ऐसे में उनके कदमों का मूल्यांकन करना ठीक नहीं होगा.
उन्होंने कहा कि "सरकार की प्रदर्शनकारियों के ऊपर की गईं कार्रवाइयां बताती हैं कि वे सीजेपी से भयभीत थे."
प्रदर्शन की तारीख और स्थान की जानकारी तो सीजेपी ने पहले ही साझा कर दी थी, लेकिन प्रदर्शन के समय और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर पर्याप्त स्पष्टता न होने के कारण संगठन पर सवाल उठ रहे हैं.
आलोचकों का आरोप है कि इससे समर्थकों के बीच भ्रम और अव्यवस्था की स्थिति पैदा हुई.
इस आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए सीएसडीएस के संजय कुमार का कहना है कि कुछ जानकारियों को जानबूझकर अस्पष्ट रखना भी आंदोलन की रणनीति का हिस्सा हो सकता है.
उनके मुताबिक, प्रदर्शन स्थल को लेकर जानकारी स्पष्ट थी, लेकिन देशभर से आने वाले प्रदर्शनकारियों का एक ही समय पर एक साथ जुट पाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था.
वे आगे कहते हैं, "मगर उन्हें साफ़ पता था कि सरकार जिस तरह की तैयारियाँ कर रही है, वह उन्हें प्रदर्शन नहीं करने देगी. फिर भी वे खुलकर सामने आए और, जैसा माना जा रहा था, डिटेन कर लिए गए. सरकार के लिए उनकी लोकेशन का पता लगाना वैसे भी मुश्किल नहीं होता."
सीजेपी की एक और आलोचना होती आई है कि इनके लीडरों ने अन्य नेताओं की तरह ज़मीन पर उतरकर लाठियां नहीं खाईं.
इस आलोचना पर राजनीतिक विश्लेषक संजय सिंह ने कहा कि हर संगठन में बड़े नेताओं की भूमिका योजना बनाने की होती है, उसको लागू कराने की भूमिकाएं अलग लोग निभा रहे होते हैं. ऐसे में किसी लीडर को सिर्फ़ इस बात से आंका नहीं जा सकता कि वो ज़मीन पर कितना मौजूद रहा.
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