जौहर: कायरता नहीं, इतिहास के कठिन दौर में स्त्री-साहस और स्वाभिमान का प्रश्न
Updated on
14-09-2026 11:49 AM
दिव्या सिंह सिसोदिया
इतिहास केवल घटनाओं का सिलसिला नहीं होता, वह अपने समय की परिस्थितियों, सामाजिक संरचनाओं, युद्ध की प्रकृति और मानवीय मनोविज्ञान को समझने का माध्यम भी होता है। इसलिए इतिहास के किसी प्रसंग का मूल्यांकन करते समय उसे वर्तमान समय की सुविधाओं और आधुनिक अवधारणाओं के एकांगी चश्मे से देखना कई बार उसके मूल संदर्भ को ही नष्ट कर देता है।
भारतीय इतिहास में जौहर ऐसा ही एक विषय है, जिसे लेकर लंबे समय से विभिन्न मत रहे हैं। इसे कोई परंपरा के रूप में देखता है, कोई युद्धकालीन त्रासदी के रूप में और कोई स्त्री के आत्मसम्मान तथा निर्णय की चरम अभिव्यक्ति के रूप में। लेकिन इसे सीधे-सीधे ‘कायरता’ कह देना उस जटिल ऐतिहासिक परिस्थिति को अत्यंत सरल बना देना है, जिसमें इन घटनाओं ने जन्म लिया।
संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत में जौहर के चित्रण और अभिनेत्री स्वरा भास्कर द्वारा उस दृश्य को लेकर व्यक्त की गई आलोचना ने इसी पुराने प्रश्न को फिर सार्वजनिक विमर्श में ला दिया कि क्या जौहर को केवल स्त्री की असहायता के रूप में देखा जाए, या उसके पीछे उस समय की युद्ध परिस्थितियों, सामाजिक मान्यताओं और सम्मान की अवधारणा को भी समझा जाए?
वीरता केवल रणभूमि में तलवार उठाने का नाम नहीं :
युद्ध के इतिहास को केवल सैनिकों की वीरता से नहीं समझा जा सकता। युद्ध के पीछे परिवारों, माताओं, पत्नियों और बच्चों का भी संसार होता है। राजपूताने की ऐतिहासिक परंपरा में ऐसी स्त्रियों के अनेक उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने अपने पति, पुत्र और भाइयों को रणभूमि के लिए विदा किया। कल्पना कीजिए उस मनःस्थिति की, जब किसी माँ को यह पता हो कि उसका पुत्र युद्ध में जा रहा है और संभव है कि वह कभी वापस न लौटे। फिर भी वह उसके माथे पर विजय-तिलक लगाकर उसे रणभूमि की ओर भेजती है। यह निर्णय आधुनिक जीवन की सहज परिस्थितियों में समझना कठिन हो सकता है, लेकिन अपने समय के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में यह असाधारण मानसिक दृढ़ता का परिचायक था।
भारतीय परंपरा में वीरांगना केवल वह नहीं रही जिसने हाथ में तलवार उठाई। वह माँ भी वीरांगना थी जिसने योद्धा को जन्म दिया, उसे शस्त्र और युद्धनीति की शिक्षा दी और आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र, राज्य और समुदाय की रक्षा के लिए उसे रणभूमि में भेजा।
‘वे लड़ी क्यों नहीं?’ उत्तर इतिहास के संदर्भ में तलाशें :
जौहर को लेकर अक्सर पूछा जाता है कि यदि स्त्रियाँ साहसी थीं तो उन्होंने स्वयं हथियार उठाकर युद्ध क्यों नहीं किया? यह प्रश्न पहली दृष्टि में तार्किक प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसका उत्तर उस समय की सैन्य परिस्थितियों को समझे बिना नहीं दिया जा सकता। मध्यकालीन युद्ध आधुनिक युद्धों की तरह नहीं थे। किलों की घेराबंदी, संख्या में भारी असमानता, संसाधनों की कमी और लंबे समय तक चलने वाले सैन्य संघर्षों के बाद जब कोई दुर्ग अंतिम चरण में पहुँचता था, तब परिस्थितियाँ अत्यंत भयावह हो सकती थीं।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मध्यकालीन युद्धों में विजेता पक्ष द्वारा पराजित शासक परिवारों और महिलाओं को बंदी बनाने की घटनाएँ इतिहास में दर्ज हैं। युद्धबंदी बनाए जाने, दासता और महिलाओं को विजित संपत्ति का हिस्सा मानने जैसी प्रथाएँ केवल भारत तक सीमित नहीं थीं; विश्व के अनेक मध्यकालीन समाजों में इनके उदाहरण मिलते हैं।
ऐसे संदर्भ में जौहर को समझने का एक दृष्टिकोण यह है कि यह पराजय की स्थिति में बंदी बनाए जाने और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में संभावित अपमान से बचने के लिए सामूहिक मृत्यु का निर्णय था। हालाँकि इतिहास के गंभीर अध्ययन के लिए यह भी आवश्यक है कि जौहर को केवल रोमांटिक वीरगाथा बनाकर न प्रस्तुत किया जाए। यह उन स्त्रियों के सामने उपस्थित अत्यंत भयावह परिस्थितियों और सीमित विकल्पों की त्रासदी भी थी। इसी दोहरे संदर्भ को समझना इतिहास के प्रति अधिक ईमानदार दृष्टिकोण होगा।
जौहर को समझने स्त्री को भी समझना होगा :
आधुनिक स्त्री-विमर्श का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—स्त्री को अपने शरीर और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार किस सीमा तक है? यदि आज हम स्त्री की स्वायत्तता और उसके अपने शरीर पर अधिकार की बात करते हैं, तो इतिहास की उन स्त्रियों के निर्णयों को भी केवल ‘लाचारी’ कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा। उनके निर्णय आज की हमारी नैतिक और सामाजिक कसौटियों से अलग हो सकते हैं, लेकिन उन्हें समझने के लिए उस समय की परिस्थितियों और उन स्त्रियों की अपनी मान्यताओं को भी महत्व देना होगा।
जौहर का अर्थ यह नहीं कि उस घटना से जुड़ी हर स्त्री की व्यक्तिगत इच्छा और अनुभव को हम निश्चित रूप से जानते हैं। इतिहास में सामूहिक परंपरा, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत निर्णय के बीच की रेखाएँ हमेशा स्पष्ट नहीं होतीं। इसलिए जौहर को न तो अंधमहिमामंडन की आवश्यकता है और न ही बिना संदर्भ के ‘कायरता’ कहकर खारिज करने की।
यह कहना भी गलत होगा कि भारतीय इतिहास में स्त्रियों के पास प्रतिरोध का केवल एक ही मार्ग था। आवश्यकता पड़ने पर भारतीय महिलाओं ने स्वयं हथियार उठाए और युद्ध का नेतृत्व किया। रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई और अनेक अन्य वीरांगनाएँ इसका प्रमाण हैं। राजपूत इतिहास में भी ऐसी स्त्रियों के उल्लेख मिलते हैं जिन्होंने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध और राज्य संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसलिए भारतीय स्त्री के साहस को केवल जौहर के संदर्भ में सीमित करना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। भारतीय इतिहास में स्त्री-साहस के अनेक रूप रहे हैं—रणभूमि में तलवार उठाना, किले की रक्षा करना, शासन संभालना, योद्धाओं को तैयार करना और असाधारण परिस्थितियों में अपने जीवन के बारे में कठिन निर्णय लेना।
इतिहास राजनीतिक चश्मे से नहीं, अध्ययन की दृष्टि से पढ़ें:
आज सोशल मीडिया और लोकप्रिय संस्कृति के दौर में इतिहास के जटिल विषय कुछ पंक्तियों और तीखी टिप्पणियों में बदल जाते हैं। किसी ऐतिहासिक घटना पर असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन असहमति को इतिहास के प्रति उपेक्षा में बदल देना उचित नहीं। जौहर जैसे विषयों पर बहस होनी चाहिए। यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या उस परंपरा में पितृसत्ता की भूमिका थी, क्या सामाजिक दबाव मौजूद थे और क्या महिलाओं के पास वास्तव में स्वतंत्र विकल्प थे। लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी उतनी ही गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि क्या उन स्त्रियों की अपनी ऐतिहासिक चेतना, प्रतिष्ठा और निर्णय को पूरी तरह नकार देना न्यायसंगत है?
इतिहास का उद्देश्य अतीत के लोगों को आज के साँचे में फिट करना नहीं, बल्कि उनके समय और परिस्थितियों को समझना है। जौहर को लेकर आज अलग-अलग मत हो सकते हैं। कोई इसे त्रासदी माने, कोई सामंती व्यवस्था की परिणति और कोई आत्मसम्मान की चरम अभिव्यक्ति, लोकतांत्रिक समाज में इन सभी दृष्टिकोणों पर बहस की गुंजाइश है। लेकिन उन स्त्रियों को केवल ‘कायर’ कह देना, जिन्होंने अपने समय की असाधारण और भयावह परिस्थितियों में जीवन और मृत्यु के बीच एक कठिन निर्णय लिया, इतिहास की जटिलता को नकारना होगा।
हमारे इतिहास की वीरांगनाओं को समझने के लिए न अंधभक्ति की आवश्यकता है और न अंधविरोध की। आवश्यकता है अध्ययन, संदर्भ और संवेदनशील दृष्टि की।इतिहास पर प्रश्न उठाइए, किंतु इतिहास को पढ़कर। परंपराओं की आलोचना कीजिए, किंतु उनके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ को समझकर। और सबसे बढ़कर उन स्त्रियों के साहस और अस्तित्व को अपनी सुविधा के वैचारिक चश्मे से छोटा मत कीजिए। क्योंकि इतिहास में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं जिन्हें आज स्वीकार करना कठिन हो सकता है, लेकिन उन्हें समझने के लिए उस दौर की परिस्थितियों में उतरना पड़ता है। जौहर का मूल्यांकन भी उसी ऐतिहासिक संवेदनशीलता के साथ किया जाना चाहिए।
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