हिरासत में मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के डीजीपी को लगाई कड़ी फटकार, सीबीआई जांच और 25 लाख मुआवजे के आदेश
Updated on
12-08-2026 07:29 PM
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में पुलिस हिरासत के दौरान एक कैदी की संदिग्ध और दर्दनाक मौत के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करते हुए इसे "न्याय व्यवस्था का अपमान" और "सफेद झूठ" करार दिया है। साथ ही, मामले की निष्पक्ष जांच अब केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दी गई है तथा पीड़ित परिवार को 25 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा देने का आदेश दिया गया है।
मामला बिलासपुर के पुलिस थाना सीपत का है। मृतक श्रवण सूर्यवंशी उर्फ सरवन तामरे उम्र 34 वर्ष को पुलिस ने छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत 18 जनवरी, 2024 को गिरफ्तार किया था।
पुलिस के अनुसार उनके पास से 6 लीटर कच्ची महुआ शराब बरामद हुई थी। गिरफ्तारी और रिमांड के बाद उन्हें सेंट्रल जेल, बिलासपुर में दाखिल कराया गया, जहां 21 जनवरी को तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें सिम्स ले जाया गया। इलाज के दौरान 22 जनवरी, 2024 की सुबह करीब 6:00 बजे उनकी मौत हो गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासे: शरीर पर थीं गंभीर चोटें
मृतक की मौत के बाद जब मेडिकल बोर्ड द्वारा पोस्टमार्टम कराया गया, तो शरीर पर मौजूद चोटों ने पुलिस के दावों की पोल खोल दी। रिपोर्ट में गंभीर चोटें दर्ज की गईं।
सिर की ओसीसीपिटल खोपड़ी पर बिना टांके का 4 × 2 × 0.5 सेमी का गहरा घाव (लैसरेशन), जिसमें सूजन और खून बह रहा था।
दाहिने कलाई के ऊपर सूजन और लालिमा।
दोनों पैरों पर सूजन।
दाहिनी जांघ और गर्दन के पीछे गहरे नीले-हरे रंग के निशान (कंटूशन)।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि मौत का मुख्य कारण सिर पर किसी भारी और कठोर वस्तु के प्रहार से लगी चोट और उसकी जटिलताओं के चलते हुआ कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट था।
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे परिजन
मृतक की पत्नी लहरा बाई तामरे और उनकी पुत्रियों ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर 50 लाख रुपये के मुआवजे और दोषियों पर क्रिमिनल केस दर्ज करने की मांग की थी। हाई कोर्ट ने यह तो माना कि यह हिरासत में हिंसा और मौलिक अधिकारों का हनन है, लेकिन केवल 1 लाख रुपये का मामूली मुआवजा देकर और पुलिस अधिकारियों पर बिना कोई कार्रवाई किए मामला समाप्त कर दिया। इसके खिलाफ परिजन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
डीजीपी के जवाब पर भड़ा कोर्ट्र कहा- यह कवर-अप स्टोरी" और "अदालत की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान जब छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक, महानिदेशक (जेल) और प्रधान सचिव (गृह) वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए, तो कोर्ट ने कड़े सवाल किए।
डीजीपी द्वारा यह तर्क दिए जाने पर कि "सीआरपीसी की धारा 176 के तहत न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस को नहीं मिली थी, इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं हुई", सुप्रीम कोर्ट भड़क उठा। कोर्ट ने इसे "कवर-अप स्टोरी" और "अदालत की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास" बताया। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा बोला गया यह झूठ पूरी तरह से निंदनीय और गैर-जिम्मेदाराना है।
सुप्रीम कोर्ट के बड़े निर्देश और फैसले
सीबीआई जांच के आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि श्रवण सूर्यवंशी की हिरासत में हुई मौत के पूरे घटनाक्रम की जांच अब केंद्रीय जांच ब्यूरो सीबीआई करेगी। साथ ही, इस मामले में लीपापोती करने वाले और समयानुसार कार्रवाई न करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाएगी।
25 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा: अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता पत्नी लहरा बाई तामरे के बैंक खाते में 4 सप्ताह के भीतर 25,00,000 रुपये (पच्चीस लाख रुपये) का अंतरिम मुआवजा जमा करे।
रिकार्ड सौंपने के निर्देश: छत्तीसगढ़ के डीजीपी को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि मामले से जुड़े तमाम दस्तावेज एक सप्ताह के भीतर विशेष संदेशवाहक के जरिए सीबीआई निदेशक को सौंपे जाएं। इस मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर, 2026 को तय की गई है।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में पुलिस हिरासत के दौरान एक कैदी की संदिग्ध और दर्दनाक मौत के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।सुप्रीम कोर्ट ने राज्य…
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