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प्लास्टिक से मुक्ति दे यह कप पौधे को देता है पोषण, भूमि भी नहीं होती प्रदूषित

Updated on 16-04-2026 06:24 PM
 दुर्ग के युवा उद्यमी अंकुश जैन ने चार साल की मेहनत और 260 प्रयोगों के बाद एक ऐसा 'बायोडिग्रेडेबल पोषक कप' विकसित किया है, जिसे इसी वर्ष भारत सरकार ने पेटेंट से नवाजा है। 11 जैविक तत्वों से बना यह कप न केवल पौधों को खाद बनकर पोषण देता है, बल्कि प्लास्टिक के प्रदूषण को भी जड़ से खत्म करता है। रोपाई के समय इसे निकालने का झंझट नहीं है। यह मिट्टी में घुलकर खुद प्रकृति का हिस्सा बन जाता है। यह नवाचार आधुनिक खेती के लिए एक सस्ता, सुरक्षित और हरा-भरा भविष्य है।
आज जब खेती में प्लास्टिक का उपयोग मिट्टी की सेहत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है, ऐसे समय में यह तकनीक एक कारगर समाधान के रूप में सामने आई है। पारंपरिक काली पालिथीन और प्लास्टिक ट्रे के विकल्प के रूप में यह जैविक कप न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि पौधों के विकास में भी सहायक सिद्ध हो रहा है।
एमबीए स्नातक अंकुश जैन ने यह कप 11 जैविक तत्वों गोबर, वर्मी कंपोस्ट, नीम खली, सरसों खली, करंज खली व चूना पत्थर के मिश्रण से तैयार किया है। इसकी कीमत फिलहाल चार रुपये है, जिसे मांग के अनुसार और घटाया जा सकता है। पिछले पांच महीनों में लगभग एक लाख कप तैयार कर मध्यप्रदेश, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र व ओडिशा सहित कई राज्यों में सप्लाई की जा चुकी है।

तकनीक की खासियत
तेजी से विकास: नर्सरी अब 30 की बजाय सिर्फ 20 दिनों में तैयार हो रही है।

बेहतर जड़ें: जैविक कपों में जड़ें गहराई तक बढ़ती हैं, जिससे पौधा मजबूत बनता है।

कीटनाशक कम: रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे लागत 50% तक घटती है।

जीरो ट्रांसप्लांट शाक: जड़ें सुरक्षित, कप खाद बनकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।

लागत में कमी, उत्पादन में वृद्धि
इस जैविक कप में मौजूद पोषक तत्व पौधों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं, जिससे कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों की जरूरत लगभग 50% तक घट जाती है। जड़ों के बेहतर विकास से पौधे अधिक मजबूत और स्वस्थ बनते हैं, परिणामस्वरूप उत्पादन की गुणवत्ता भी सुधरती है।
राष्ट्रीय स्तर पर मिल रही पहचान
दिल्ली के एआई टेक और पुणे की बड़ी कृषि प्रदर्शनियों में इस स्टार्टअप को काफी सराहा गया है। यह नवाचार न केवल रासायनिक खेती को जैविक खेती की ओर मोड़ने का एक बड़ा जरिया बन रहा है, बल्कि प्लास्टिक कचरे को कम कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

एग्री-टेक की ओर बदला करियर
वर्ष 2012 में मुंबई से एमबीए करने के बाद अंकुश जैन ने रियल एस्टेट के क्षेत्र में काम शुरू किया था। इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि प्रदेश में कृषि भूमि का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है और किसानों की रुचि भी कम हो रही है। इस सोच ने उन्हें वर्ष 2017 में खेती की ओर मोड़ा। उन्होंने 11 एकड़ में ग्रीनहाउस स्थापित किया और नर्सरी से जुड़ी समस्याओं को करीब से समझा। इन्हीं अनुभवों ने उन्हें इस इको-फ्रेंडली कप के विकास के लिए प्रेरित किया। उन्होंने वर्ष 2022 में अपने स्टार्टअप की नींव रखी थी।

दुर्ग के युवा उद्यमी अंकुश जैन द्वारा विकसित बायोडिग्रेडेबल ‘पोषक कप’ को भारत सरकार से पेटेंट प्राप्त हो चुका है। यह पेटेंट 21 मई 2025 को प्रकाशित हुआ, जिसका पेटेंट नंबर 202521049112 है। यह नवाचार खेती को प्लास्टिक मुक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। पेटेंट के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों में लैब रिपोर्ट और फील्ड ट्रायल से जुड़े फोटो शामिल किए गए हैं, जो इसके प्रयोगात्मक आधार को दर्शाते हैं। इस तकनीक की प्रभावशीलता को लेकर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में परीक्षण और ट्रायल किए जा चुके हैं।

इसके अलावा, छत्तीसगढ़ की अग्रणी निजी कंपनी वीएनआर सीड्स ने भी अपने स्तर पर परीक्षण कर सकारात्मक परिणाम दिए हैं। वर्तमान में इस नवाचार की परीक्षण प्रक्रिया आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) में भी जारी है। तकनीक की विश्वसनीयता को और मजबूती तब मिली जब आईजीकेवी की ओर से इस स्टार्टअप को 25 लाख रुपये का ग्रांट स्वीकृत किया गया। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के स्टार्टअप्स में चयनित कुछ उद्यमियों में अंकुश जैन भी शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक के परीक्षण परिणाम व्यापक स्तर पर सफल रहते हैं, तो यह खेती की लागत घटाने, उत्पादन बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकती है।


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