ट्रंप को भारत के ख़िलाफ़ मिला नया हथियार, एक्सपर्ट्स इसे रूस से आगे का मामला क्यों बता रहे हैं?
Updated on
19-09-2026 02:55 PM
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस बिल पर हस्ताक्षर कर दिया है, जिसमें रूस से ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर 100 फ़ीसदी तक टैरिफ़ लगाने का प्रावधान है.
ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद यह बिल क़ानून बन गया है और ट्रंप को भारत के ख़िलाफ़ भी 100 फ़ीसदी तक टैरिफ़ लगाने का अधिकार मिल गया है.
गुरुवार को कड़े शब्दों में जारी एक बयान में भारत ने कहा कि उसने हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ चर्चा की है. भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा, "न सिर्फ़ द्विपक्षीय संबंधों बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार पर भी इसके संभावित प्रभावों को भारतीय पक्ष ने बहुत स्पष्ट रूप से सामने रखा है."
अमेरिका के नए क़दम में रूसी तेल या प्राकृतिक गैस के पाँच सबसे बड़े खरीदारों को निशाना बनाया गया है. इससे भारत, चीन और अमेरिका के सहयोगी तुर्की पर नए शुल्क लगाए जाने का ख़तरा पैदा हो गया है.
अभी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका अंततः इन नई शक्तियों का इस्तेमाल करेगा या नहीं लेकिन इससे उसे एक हथियार ज़रूर मिल गया है.
भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी क़रीब पांचवां हिस्सा है, जिससे वह भारत का सबसे बड़ा बाज़ार है. ऐसे में टैरिफ़ और बढ़ता है तो भारत के लिए बड़ा झटका होगा.
भारत के प्रति ट्रंप की नीति को कई नज़रियों से देखा जा रहा है. इस सवाल की भी समीक्षा की जा रही है कि ट्रंप वाक़ई रूस से संबंधों के कारण भारत से नाराज़ हैं या मामला उससे आगे का है.
पूर्व विदेश सचिव और अमेरिका में भारत की राजदूत रहीं निरूपमा मेनन राव मानती हैं कि दोनों देशों के बीच बढ़ता फासला का कारण केवल रूसी तेल नहीं है.
'मामला रूस से आगे का '
निरूपमा मेनन राव ने एक्स पर लिखा है, ''ट्रंप की नीति दोनों देशों के बीच साझेदारी के अर्थ को लेकर एक गहरे मतभेद की ओर इशारा करती है. अमेरिका अक्सर रणनीतिक सामंजस्य को राजनीतिक बाध्यता से जोड़कर देखता है. वहीं, भारत साझेदारी को संप्रभु शक्तियों के बीच सहयोग के रूप में देखता है. इनके बीच रूस, ईरान और चीन से निपटने के तरीक़े को लेकर मतभेद बने रहेंगे. जब ऐसे मतभेदों को सार्वजनिक रूप से वफ़ादारी की परीक्षा में बदल दिया जाता है तो कूटनीति संवाद के बजाय दिखावे में बदल जाती है और समझौते या सुलह की गुंजाइश भी कम हो जाती है.''
निरूपमा मेनन राव कहती हैं, ''भारत को आहत राष्ट्रवाद के साथ प्रतिक्रिया देने की ज़रूरत नहीं है. रणनीतिक स्वायत्तता की असली कसौटी यह नहीं है कि ऐसे दबाव की कितनी तीखी आलोचना की जाती है, बल्कि यह है कि देश उस दबाव को किस हद तक झेल सकता है. इसके लिए डिफेंस सप्लाई के सोर्स में विविधता, अधिक ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी क्षमता, मज़बूत इन्फ़्रास्ट्रक्चर और लचीलापन ज़रूरी है. इन बुनियादों के बिना स्वायत्तता सिर्फ़ ऐसी बयानबाजी बनकर रह जाएगी, जिसके पीछे निर्भरता मौजूद हो.''
'लेकिन वॉशिंगटन को भी अपने रुख़ में मौजूद विरोधाभास को समझना होगा. वह चाहता है कि भारत एशिया में अमेरिका के अनुकूल शक्ति संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाए लेकिन दूसरी ओर नई दिल्ली से अपनी स्वतंत्र रणनीतिक सोच और फ़ैसले लेने की आज़ादी सीमित करने की अपेक्षा करता है. एक मज़बूत भारत की ज़रूरत और एक ऐसे भारत की अपेक्षा, जो अमेरिकी रुख़ के मुताबिक़ चले, दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं.''
निरूपमा मेनन राव ने लिखा है, ''यह संबंध इतना अहम है कि इसे इस बहस तक सीमित नहीं किया जा सकता कि कौन किससे कितना तेल ख़रीदता है. भारत को तकनीक, निवेश और एशिया में शक्ति संतुलन के लिए अमेरिका की ज़रूरत है. अमेरिका को ऐसे भारत की ज़रूरत है जो सक्षम, आत्मविश्वासी हो और चीन के प्रभुत्व का सामना कर सके.''
''दोनों देशों को दोस्ती की भावुक पुष्टि की ज़रूरत नहीं है. दोनों को सीमाओं की अधिक स्थिर समझ की ज़रूरत है. भारत को रणनीतिक स्वायत्तता को राष्ट्रीय क्षमता में बदलना होगा और अमेरिका को यह समझना होगा कि साझेदारी, दूसरे पक्ष की अधीनता का दूसरा नाम नहीं है. काम मतभेदों को ख़त्म करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर मतभेद दोनों देशों के संबंधों पर जनमत संग्रह में न बदल जाए.''
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