जस्टिस कौल की किताब में पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ के बारे में क्या लिखा है, जिस पर कांग्रेस ने सरकार को घेरा
Updated on
25-10-2026 04:44 PM
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ फिर से सुर्ख़ियों में हैं और इसकी वजह है, उनके सहयोगी रहे जस्टिस संजय किशन कौल के दावे.
जस्टिस कौल ने अपनी आने वाली किताब 'विदाउट फ़ियर ऑर फ़ेवर' में दर्ज एक घटना का ज़िक्र एक इंटरव्यू में किया है.
इसमें उन्होंने दावा किया कि पूर्व चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित नामों पर औपचारिक चर्चा से पहले ही सरकार के साथ उन पर विचार-विमर्श करते थे.
जस्टिस कौल के अनुसार, उन्हें यह तरीक़ा पसंद नहीं था और यह सरकार से पहले ही 'मंज़ूरी' लेने जैसा था.
हालांकि, जस्टिस कौल के दावों पर 'इंडियन एक्सप्रेस' से चंद्रचूड़ ने कहा कि संजय कौल ने जो बात कही है, किस संदर्भ में कही है, उस पर अभी टिप्पणी करना मुश्किल है क्योंकि उन्होंने अभी उनकी किताब पढ़ी नहीं है.
जस्टिस कौल के बयान पर कांग्रेस ने कहा है कि जस्टिस कौल की क़िताब ने मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर न्यायपालिका को 'दबाव डालने और उसकी स्वतंत्रता को कमज़ोर' करने के आरोप लगाए.
जस्टिस कौल ने अपनी किताब को लेकर यह इंटरव्यू वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को दिया है.
उन्होंने इस इंटरव्यू में कहा, "कॉलेजियम की बैठक के दौरान चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ उन्हें अलग से एक बैठक में ले गए और पूछा कि क्या उन्हें प्रस्तावित नियुक्तियों पर सरकार की राय जानने के लिए उसे फ़ोन करना चाहिए."
जस्टिस कौल ने कहा कि उन्होंने तत्कालीन चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ से कहा कि कॉलेजियम में नामों पर विचार-विमर्श के दौरान ऐसा नहीं किया जाना चाहिए.
जस्टिस कौल ने दावा किया कि कॉलेजियम पांच नामों पर सहमत हो गया था. लेकिन चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ चाहते थे कि एक छठे नाम को भी मंज़ूरी दी जाए, जिसे आख़िरी वक़्त में आगे बढ़ाया गया था.
जस्टिस कौल और कॉलेजियम के दूसरे सदस्य इसके लिए तैयार नहीं थे.
जस्टिस कौल ने कहा, "हो सकता है कि उन्होंने दूसरे नामों के लिए, छठे नाम समेत, सरकार से पहले ही किसी तरह की मंज़ूरी ले ली हो."
जस्टिस कौल ने पूर्व सीजेआई पर क्या आरोप लगाए
जब इंटरव्यू में थापर ने पूछा कि क्या चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कॉलेजियम के फ़ैसले से पहले ही सरकार से मंज़ूरी ले ली थी, तो जस्टिस कौल ने जवाब दिया, "दुर्भाग्य से, नामों पर चर्चा करने और सरकार के साथ पहले ही किसी तरह की बातचीत करने की यह एक प्रथा बन गई है. ऐसा होता रहा है. मुझे लगता है कि चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ से पहले भी और उनके बाद भी ऐसा होता रहा है. यही बात मुझे परेशान करती है."
सरकार से पहले ही "मंज़ूरी" लेने की इस अवधारणा से असहमति जताते हुए जस्टिस कौल ने कहा कि कॉलेजियम के फ़ैसले के बाद सरकार से विचार-विमर्श करना अलग बात है.
इंटरव्यू के दौरान थापर ने जस्टिस कौल की आने वाली किताब का एक अंश पढ़ा.
इसमें लिखा है, "विचार-विमर्श और उस प्रक्रिया में फ़र्क़ है, जिसे मैं पहले से मंज़ूरी लेना मानने लगा था. यानी कॉलेजियम में औपचारिक चर्चा होने से पहले ही सरकार की सहमति लेना. इससे ग़लत संदेश जाता है."
थापर ने किताब में जस्टिस कौल की इस टिप्पणी का भी ज़िक्र किया कि "नियुक्तियों के मामले में चंद्रचूड़ सरकार के प्रति ज़रूरत से ज़्यादा नरम थे."
जब जस्टिस कौल से पूछा गया कि क्या तत्कालीन चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ का यह रवैया कॉलेजियम व्यवस्था को कमज़ोर कर रहा था, तो उन्होंने कहा, "उनका मानना था कि यह प्रक्रिया पहले से इसी तरह चलती आ रही है. मेरा मानना था कि अगर दो साल के कार्यकाल वाला कोई चीफ़ जस्टिस ऐसा करता है, तो उसके बाद आने वाले चीफ़ जस्टिस के लिए इस प्रथा का पालन न करना मुश्किल हो जाएगा. उनके कार्यकाल छोटे होते हैं और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों से पहले सरकार एक ख़ास तरीक़े की आदी हो जाएगी. इसी वजह से मैंने उन्हें हर बात पर पहले ही सरकार से चर्चा करने से रोका."
जस्टिस कौल ने आगे कहा, "अगर आप पूरी सूची पर पहले ही चर्चा कर लेते हैं, तो इससे अपनी तरह की समस्याएं पैदा होती हैं."
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह सरकार के साथ चर्चा करने के ख़िलाफ़ नहीं थे, लेकिन यह चर्चा कॉलेजियम की बैठक से पहले नहीं होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि चर्चा करने की अवधारणा ग़लत है. समस्या यह है कि यह किस चरण में और किस तरीक़े से होती है."
जस्टिस कौल ने कहा कि उन्हें लगा था कि चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ इस बात से परेशान थे कि कॉलेजियम छठे नाम को मंज़ूरी नहीं दे रहा था.
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यही बात उन्हें परेशान कर रही थी."
जब उनसे पूछा गया कि क्या वह जस्टिस चंद्रचूड़ को कमज़ोर चीफ़ जस्टिस मानते हैं, तो जस्टिस कौल ने कहा, "चीफ जस्टिस की दो भूमिकाएं होती हैं. एक न्यायिक और दूसरी प्रशासनिक. मुझे उनकी न्यायिक भूमिका को लेकर चिंता नहीं थी. मेरा मानना है कि उनमें इसके लिए बौद्धिक क्षमता, योग्यता और मेहनत करने की क़ाबिलियत थी. लेकिन सरकार के साथ विचार-विमर्श के मामले में मुझे लगा कि वह ज़रूरत से ज़्यादा उसके प्रति नरम थे. प्रशासनिक मामलों में सरकार के साथ बहुत ज़्यादा चर्चा होती थी."
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