मुकेश अंबानी से मिलने जामनगर क्यों गए अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो
Updated on
25-10-2026 04:46 PM
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो 6 महीने के भीतर दूसरी बार भारत के दौरे पर थे.
इस दौरे के दौरान सबसे ज़्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि रुबियो ने दिल्ली के बजाय जामनगर जाने का फैसला क्यों किया और गुजरात की एक रिफ़ाइनरी का भारत-अमेरिका संबंधों के भविष्य से आख़िर क्या लेना-देना है?
मुंबई में रुबियो की टाटा और अडानी समूह के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात और जामनगर में मुकेश अंबानी के साथ बातचीत इस बात की ओर इशारा करती है कि भारत की कारोबारी ताक़त और देश की विदेश नीति के बीच रिश्ता लगातार गहरा होता जा रहा है.
उधर अमेरिका में ईंधन की क़ीमतें बढ़ रही हैं और नवंबर में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं. ट्रंप अपने दोनों कार्यकालों के दौरान अब तक की सबसे कम अप्रूवल रेटिंग का सामना कर रहे हैं.
ऐसे में भारत के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाना और भारतीय कंपनियों से अमेरिका में ज़्यादा निवेश हासिल करना अमेरिकी सरकार की अहम प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है.
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत और अमेरिका के रिश्तों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं. दोनों देशों के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजहों में से एक रूस से भारत की तेल खरीद पर अमेरिका का दबाव रहा है. ऐसे माहौल में अमेरिकी ऊर्जा रणनीति में रिलायंस की बढ़ती अहमियत एक बड़ा सवाल खड़ा करती है.
क्या भारत इस कंपनी के आर्थिक प्रभाव का इस्तेमाल कूटनीतिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए कर सकता है?
और जब कारोबारी हित विदेश नीति के साथ पहले से ज़्यादा गहराई से जुड़ते जा रहे हैं, तो भारत के कूटनीतिक फ़ैसलों पर निजी कंपनियों का प्रभाव आख़िर कितना बढ़ने वाला है?
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज्म मुकेश शर्मा ने तेल मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा और कूटनीतिक मामलों की पत्रकार तृप्ति नाथ से बातचीत की.
'रिलायंस की रिफ़ाइनरी, अमेरिका में चुनावी मुद्दा'
मार्को रुबियो की मुंबई में एस जयशंकर से मुलाक़ात हुई और वह जामनगर चले गए.
घटनाओं और स्थानों के इस क्रम के आधार पर अमेरिका की प्राथमिकताओं के बारे में तृप्ति नाथ कहती हैं कि मुंबई भारत की वित्तीय राजधानी और व्यापारिक केंद्र है. चूंकि रुबियो इस बार व्यापार, कारोबारी मामलों और तकनीकी विषयों पर ज़्यादा जोर दे रहे थे इसलिए उनका पूरा ध्यान मुंबई पर रहा. इसी वजह से वह दिल्ली नहीं आए.
जहां तक जामनगर जाने की बात है, वहां दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफ़ाइन करने की सुविधा है और उसकी क्षमता भी उल्लेखनीय है. इसीलिए जब रुबियो भारत आए, तो उन्होंने भारत को तेल रिफ़ाइन की महाशक्ति भी कहा.
वह यह भी कहती हैं कि इस बार रुबियो के जामनगर जाने को बहुत ज़्यादा महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि अगले महीने अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं. वहां डीज़ल की कीमतों का मुद्दा चुनाव में बहुत बड़ा बन गया है.
नरेंद्र तनेजा इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि अमेरिकी विदेश मंत्री जामनगर इसलिए भी गए, क्योंकि रिलायंस अमेरिका में एक बड़ी रिफ़ाइनरी स्थापित कर रही है.
वह कहते हैं कि पिछले 50 वर्षों में अमेरिका में कोई नई रिफ़ाइनरी नहीं बनी थी. वहां तेल को प्रदूषण फैलाने वाला बताकर उसके ख़िलाफ़ माहौल बनाया जाता रहा. कोई भी राज्य नहीं चाहता था कि उसके यहां तेल रिफ़ाइनरी बने, क्योंकि माना जाता है कि इससे प्रदूषण होता है.
अमेरिका में चुनाव होने वाले हैं और रिलायंस की रिफ़ाइनरी टेक्सस राज्य में चुनाव का मुद्दा बन गई है.
सीनेट के चुनाव में भी यह एक बड़ा मुद्दा है. अमेरिकी विदेश मंत्री ने यहां आकर अपने मतदाताओं को संदेश दिया है कि वह उनके लिए इतनी बड़ी रिफ़ाइनरी ला रहे हैं.
एक तरफ़ अमेरिका भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने से मना करता है. दूसरी तरफ़ ऐसा दिखाई देता है कि इस परिस्थिति से परेशान होकर उसने खुद इसमें छूट देने की पेशकश की है.
अमेरिकी विदेश नीति में इस असमंजस पर नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई स्थायी मित्र नहीं होता. कई लोग मानते हैं कि रूस हमारा मित्र है. लेकिन राजनीति को इस तरह नहीं देखा जाना चाहिए. हमें यह देखना है कि हमारी ज़रूरतें क्या हैं."
"इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि अमेरिका क्या कर रहा है, बल्कि यह है कि हम इन परिस्थितियों से कैसे निपटते हैं और अपने हितों को कैसे साधते हैं. अमेरिका के भीतर भी यह समझ है कि भारत रूस से तेल खरीदता रहे. अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा, तो दुनिया में तेल महंगा हो सकता है. अमेरिका दुनिया में तेल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है. तेल महंगा होने से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी. अमेरिका ऐसा नहीं चाहता."
तृप्ति नाथ कहती हैं कि कूटनीति परिस्थितियों के साथ बदलती है, ठीक वैसे ही जैसे राजनीति में समीकरण बदलते रहते हैं. कूटनीति में आपको अपनी राष्ट्रीय ज़रूरतों को सबसे पहले देखना होता है.
वह कहती हैं, "रुबियो यहां आए हैं और जामनगर गए हैं. वह सिर्फ किसी निजी कंपनी के बुनियादी ढांचे को देखने नहीं आए थे. उन्होंने यहां आकर यह भी कहा कि पेट्रोलियम तब तक बेकार है, जब तक उसे संसाधित न किया जाए."
"रिलायंस अमेरिका में भी निवेश कर रही है. इसलिए ज़ाहिर है कि अमेरिका अपने हितों पर नज़र रखेगा, अपने हितों को देखेगा."
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