मसाले की आड़ में अफीम का 'जहर', झारखंड के तस्करों ने आदिवासी किसानों को ठगा; ₹6.75 करोड़ की फसल जब्त
Updated on
13-03-2026 06:10 PM
बलरामपुर जिले के कुसमी ब्लॉक के त्रिपुरी और खजूरी के आदिवासी किसान फूल और मसाले की खेती के लालच में फंस गए। झारखंड के तस्करों ने उनके खेतों में अफीम की खेती करवा दी। त्रिपुरी में लगभग पौने पांच करोड़ रुपये कीमत के 43 क्विंटल अफीम के पौधे, फल और फूल जब्त किए गए। इसके बाद खजूरी गांव से लगे दुर्गम क्षेत्र से भी 285 बोरे अफीम के पौधे बरामद किए गए, जिनका वजन लगभग 19 क्विंटल है। इनकी अनुमानित कीमत करीब दो करोड़ रुपये बताई गई है। यह इलाका झारखंड की सीमा से लगा हुआ है।
दो ग्रामीणों को गिरफ्तार किया गया
खजूरी में अफीम की खेती के आरोप में सहादुर नगेशिया और टुईला नामक दो ग्रामीणों को गिरफ्तार किया गया है। सहादुर की अपनी जमीन है, जबकि टुईला ने रोपना राम से जमीन किराए पर ली थी। दोनों को झारखंड के चतरा निवासी भूपेंद्र उरांव ने मसाले की खेती का झांसा दिया था। उसी के जरिए जमीन लेकर अफीम की खेती कराई गई। त्रिपुरी और खजूरी में अफीम की खेती के मामले में अब तक नौ आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें भू-स्वामी, मजदूर और एक मध्यस्थ शामिल हैं। अब तक लगभग 62 क्विंटल अफीम के पौधे, फल, फूल और तना जब्त किए गए हैं, जिनकी अनुमानित कीमत करीब 6.75 करोड़ रुपये बताई गई है।
लाभ नहीं हो रही थी खेती से इसलिए किराए पर दी जमीन
अफीम की खेती के आरोप में गिरफ्तार सहादुर नगेशिया और टुईला नगेशिया का कहना है कि उन्हें अफीम की खेती के बारे में जानकारी नहीं थी। टुईला राम के पास अपनी जमीन नहीं है। उसने गांव के किसान रोपना से छह हजार रुपये में खेती के लिए जमीन बंधक पर ली थी। दोनों किसानों ने बताया कि झारखंड के चतरा निवासी भूपेंद्र उरांव ने उनसे संपर्क किया था और मसाले की खेती का प्रस्ताव दिया था। उसने कहा था कि इसमें अच्छी आमदनी होगी और फसल कटने के बाद मुनाफे का हिस्सा दिया जाएगा। इसी भरोसे पर उन्होंने खेत दे दिया। किसानों का कहना है कि उन्हें अब तक इस खेती के बदले कोई पैसा नहीं मिला है।
खेतों के पास झोपड़ी बनाकर रहते थे मजदूर
खजूरी में 1.47 एकड़ में झारखंड के चतरा निवासी भूपेंद्र उरांव द्वारा अफीम की खेती कराई गई थी। फसल की रखवाली के लिए स्थानीय लोगों को काम नहीं दिया गया था। झारखंड के चार से पांच लोग फसल की देखभाल करते थे और खेतों के पास झोपड़ी बनाकर रहते थे। होली के दौरान वे गांव चले गए थे, जिसके बाद दोनों स्थानीय ग्रामीण फसल की देखभाल कर रहे थे। खेतों के पास प्राकृतिक जल स्रोत से सिंचाई की जाती थी। किसानों का कहना है कि वे अफीम के पौधे को पहचानते नहीं थे, इसलिए उन्हें यह भी पता नहीं था कि इसकी खेती गैरकानूनी है
झारखंड सीमा के पास दुर्गम इलाके में हो रही थी खेती
खजूरी के तुर्रीपानी में जहां अफीम की खेती की गई थी, वहां से झारखंड की सीमा लगभग 200 से 300 मीटर दूर है। खजूरी से पहाड़ चढ़कर दूसरी ओर तराई में उतरने के बाद करीब डेढ़ किलोमीटर दूर खेत स्थित हैं। यह क्षेत्र पहले माओवाद प्रभावित रहा है और दुर्गम होने के कारण यहां लोगों का आना-जाना कम होता है। रबी सीजन में राजस्व विभाग ने इस जमीन की गिरदावरी भी नहीं की थी। पुलिस झारखंड के लोगों की संलिप्तता की जांच कर रही है और अलग-अलग टीमें लगाई गई हैं।
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