मक्का समझौते में बांग्लादेश के शामिल होने की 'इच्छा' को एक्सपर्ट्स कैसे देख रहे हैं, भारत ने की ये टिप्पणी
Updated on
22-08-2026 07:00 PM
भारतीय मीडिया में बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर के हवाले से एक बयान की काफ़ी चर्चा हो रही है.
गुरुवार रात से ही ख़बर चल रही है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान के क़रीबी सहयोगी हुमायूं कबीर ने बांग्लादेश संगबाद संस्था यानी बीएसएस से कहा कि बांग्लादेश सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की से जुड़े किसी आर्थिक या रक्षा ढांचे में शामिल होने की संभावना को लेकर सकारात्मक रुख़ रखता है.
हुमायूं कबीर की इस टिप्पणी को भारतीय मीडिया में इस रूप में देखा जा रहा है कि बांग्लादेश सऊदी, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का समझौते में शामिल होने के लिए इच्छुक है.
कहा जा रहा है कि बांग्लादेश के इस रुख़ से भारत से जारी तनाव में एक और नया आयाम जुड़ गया है.
हुमायूं कबीर ने कहा कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस के निमंत्रण पर बांग्लादेश के प्रधानमंत्री का रियाद दौरा गर्मियों के बाद अंतिम रूप लेगा.
भारत के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि वह पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रम पर क़रीबी नज़र रख रहा है.
शुक्रवार को भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते में बांग्लादेश के शामिल होने की इच्छा से जुड़ी ख़बरों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, "हम पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रम पर क़रीबी नज़र बनाए हुए हैं. फ़िलहाल मैं इतना ही कहना चाहूंगा."
मक्का समझौते को कई विशेषज्ञ भारत के ख़िलाफ़ देख रहे हैं. इस समझौते में कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला तीनों के ख़िलाफ़ माना जाएगा.
यानी भारत अगर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ऑपरेशन सिंदूर जैसी कोई सैन्य कार्रवाई करता है तो तुर्की और सऊदी अरब अपने ख़िलाफ़ मान सकते हैं.
अगर इसमें बांग्लादेश भी आ जाएगा तो ढाका में पाकिस्तान की मौजूदगी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
मक्का समझौता बांग्लादेश के हक़ में होगा?
अगर मक्का समझौते में बांग्लादेश शामिल होता है तो क्या यह उसके हक़ में होगा?
बांग्लादेश के पूर्व विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने न्यूज 18 के साथ बातचीत में कहा, ''काग़ज़ पर मक्का समझौता मुस्लिम बहुल देशों के बीच बहुपक्षीय सहयोग की एक निश्चित तस्वीर पेश कर सकता है. लेकिन अगर हम ज़मीनी हक़ीक़त देखें, तो बांग्लादेश को इससे वास्तविक और ठोस लाभ क्या मिलेगा?''
''हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताएं आर्थिक विकास, व्यापार, क्षेत्रीय स्थिरता और गुटनिरपेक्ष के अलावा संतुलित विदेश संबंध बनाए रखने पर केंद्रित हैं. अगर आप किसी सामूहिक रक्षा ढांचे में शामिल होते हैं, ख़ासकर ऐसे ढांचे में जिसमें दूर की भू-राजनीतिक परिस्थितियां और सैन्य प्रतिबद्धताएं जुड़ी हों, तो इसके जोखिम तुरंत और स्पष्ट हैं. बांग्लादेश ऐसे संघर्षों में खिंचा जा सकता है, जिनमें लड़ना उसका मक़सद नहीं है.''
मोमेन ने कहा, ''इसके अलावा, हमारी भौगोलिक और आर्थिक वास्तविकताएं तय करती हैं कि हमारे पड़ोसियों, ख़ासकर भारत के साथ मज़बूत, स्थिर और सहयोगपूर्ण संबंध महत्व रखते हैं. ऐसा कोई भी क़दम जो इस संतुलन को प्रभावित करता हो या हमें विदेशी सैन्य गुटों में उलझाता हो, बांग्लादेश के मूल राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नहीं है.''
''मेरा मानना है कि इतने बड़े रणनीतिक बदलाव के लिए जल्दबाज़ी में प्रतिबद्धता जताने के बजाय सावधानीपूर्वक और व्यापक मूल्यांकन की ज़रूरत है. दिखावे को विदेश नीति की वास्तविकता का स्थान नहीं लेना चाहिए. बांग्लादेश ने ऐतिहासिक रूप से'सबसे दोस्ती, किसी से दुश्मनी नहीं' की नीति के तहत लाभ हासिल किया है. ऐसे सैन्य गठबंधनों या रक्षा समझौतों की ओर बढ़ना, जो क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं, उल्टा असर डाल सकता है.''
''जो प्रस्ताव सामने हैं, उनकी गहनता से जांच और मूल्यांकन किया जाना चाहिए. मुझे उम्मीद है कि कोई भी बाध्यकारी फ़ैसला लेने से पहले नेतृत्व इसके लंबी अवधि के परिणामों पर सावधानीपूर्वक विचार करेगा.''
अमेरिका, फ़्रांस और दक्षिण कोरिया में बांग्लादेश के राजदूत रहे एम शाहिदुल इस्लाम भी मानते हैं कि यह बांग्लादेश के हक़ में नहीं है.
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