'मैं 17 साल का', कसाब का वो झूठ, जिसे उज्ज्वल निकम ने किया था बेनकाब
Updated on
05-10-2026 10:11 PM
26/11 मुंबई आतंकी हमले के आरोपी अजमल कसाब का मुकदमा चल रहा था. अभियोजन पक्ष के पास उसके खिलाफ गवाह थे, घटनास्थल से मिले सबूत थे और खुद कसाब के बयान भी थे. मामला पहली नजर में बेहद मजबूत दिखाई दे रहा था. लेकिन तभी कसाब ने अदालत में एक ऐसा दावा किया, जिसने पूरे केस की दिशा बदलने की कोशिश की. उसने कहा, मैं 17 साल का हूं. अब हिंदी फिल्म प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम में इसी कानूनी लड़ाई को अहम जगह दी गई है. फिल्म में राजकुमार राव मशहूर सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की भूमिका निभा रहे हैं. फिल्म के ट्रेलर में भी अदालत के अंदर कसाब का यही दावा सुनाई देता है कि मैं 17 साल का हूं.
लेकिन सवाल ये है कि अगर कसाब वाकई नाबालिग साबित हो जाता तो क्या होता? और उज्ज्वल निकम ने आखिर कैसे साबित किया कि कसाब अदालत में अपनी उम्र को लेकर झूठ बोल रहा था? और कसाब ने क्यों कहा कि वो 17 साल का है?
अप्रैल 2009 में मुकदमा शुरू होने के कुछ ही समय बाद कसाब के वकील अब्बास काजमी ने अदालत में उसकी उम्र को लेकर दावा किया. बचाव पक्ष का कहना था कि 26/11 के हमलों के वक्त कसाब नाबालिग था. इसके आधार पर उन्होंने मामले को जुवेनाइल जस्टिस कोर्ट में भेजने की मांग की.
इस दावे का महत्व इसलिए बहुत ज्यादा था, क्योंकि अगर अदालत कसाब को कानूनी तौर पर नाबालिग मान लेती, तो उसे मौत की सजा नहीं दी जा सकती थी. जुवेनाइल जस्टिस कानून के तहत उसके लिए अधिकतम सजा तीन साल के जुवेनाइल रिमांड होम तक सीमित हो सकती थी.
उज्ज्वल निकम ने इस मांग का तुरंत विरोध किया. अभियोजन पक्ष का कहना था कि उम्र कम बताने की कोशिश मुकदमे को लंबा खींचने और मौत की सजा से बचने की रणनीति थी. लेकिन केवल तर्क से कसाब की उम्र साबित नहीं हो सकती थी. निकम को ठोस सबूत चाहिए था.
जुड़ने यानी बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट और दांतों की जांच की गई. सवाल सीधा था कि कसाब का शरीर उसकी उम्र के बारे में क्या बता रहा है? मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी. इसमें एक्स-रे के जरिए जोड़ों के जुड़ने और अक्ल की दाढ़ निकलने जैसे संकेतों का अध्ययन किया गया. जांच के आधार पर कसाब की उम्र 20 से 26 साल के बीच आंकी गई.
रिपोर्ट के मुताबिक, 26 नवंबर 2008 की रात जब मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था, उस समय कसाब की उम्र कम से कम 19 साल 6 महीने थी यानी अदालत में किया गया उसका ‘मैं 17 साल का हूं’ वाला दावा मेडिकल जांच के सामने टिक नहीं पाया.
मजिस्ट्रेट के सामने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज अपने बयान में कसाब ने आधिकारिक तौर पर खुद को 21 साल का बताया था यानी अभियोजन पक्ष के पास सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट नहीं थी. उसके पास कसाब के अपने पुराने बयान, जेल और अस्पताल के आधिकारिक रिकॉर्ड और फॉरेंसिक जांच सब एक ही दिशा में इशारा कर रहे थे. बचाव पक्ष ने पाकिस्तान से जन्म प्रमाण पत्र मंगाने की कोशिश की
निकम के मुताबिक, ऐसी बदलती कहानियों का जवाब देने का सबसे मजबूत तरीका था- ऐसे सबूतों पर टिके रहना जिन्हें बदला नहीं जा सकता यानी घटनास्थल के सबूत, आधिकारिक रिकॉर्ड और मेडिकल जांच. सीधी भाषा में कहें तो कसाब अपनी कहानी बदल सकता था, लेकिन सबूत नहीं बदल सकते थे.
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