पाकिस्तान का इंडोनेशिया समेत तीन देशों से डिफेंस प्रोडक्शन पर समझौता, क्या भारत पर पड़ेगा असर?
Updated on
23-10-2026 02:31 PM
क़तर की राजधानी दोहा में बीते बुधवार को चार ऐसे देशों के रक्षा प्रतिनिधि एक मेज पर आए, जिनकी सैन्य ताक़त, आर्थिक क्षमता और जिओपॉलिटिक्स की प्राथमिकताएं एक-दूसरे से काफ़ी अलग हैं.
ये चार देश हैं पाकिस्तान, तुर्की, क़तर और इंडोनेशिया. इन देशों ने रक्षा उत्पादन, रिसर्च और डिफेंस टेक्नॉलजी के क्षेत्र में सहयोग के लिए जिस बहुपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.
इसे 'बद्र समझौता ज्ञापन' या बद्र एमओयू नाम दिया गया है.
यह घटनाक्रम इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इससे कुछ ही हफ़्ते पहले पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' हुआ था.
मध्य-पूर्व में जारी संघर्षों और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच महज कुछ हफ़्तों के ये दो बड़े रक्षा समझौते अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नई बहस छेड़ रहे हैं.
पाकिस्तान में जहाँ इसे रक्षा उद्योग के लिए एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है, वहीं भारत में भी इस नए समीकरण के सामरिक प्रभावों पर क़रीब नज़र रखी जा रही है.
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या खाड़ी देशों से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक कोई नया सैन्य ब्लॉक आकार ले रहा है?
'बद्र एमओयू' सऊदी अरब की अगुवाई वाले 'मक्का पैक्ट' से किस तरह अलग है और भारत के प्रमुख रक्षा साझेदार इंडोनेशिया का इस समझौते में शामिल होना नई दिल्ली के हितों को कैसे प्रभावित करेगा?
क़तर की डिफेंस मिनिस्ट्री ने एक आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि, रणनीतिक साझेदारी और संयुक्त सहयोग को बढ़ाने की प्रतिबद्धता के तहत दोहा में 'बद्र' समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं.
इस अवसर पर क़तर के उप प्रधानमंत्री और रक्षा राज्य मंत्री शेख़ सऊद बिन अब्दुल रहमान बिन हसन अल थानी, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाज़ा मुहम्मद आसिफ़, तुर्की के रक्षा मंत्री यासर गुलेर और इंडोनेशिया के उप रक्षा मंत्री भी मौजूद थे.
इस समझौते का सीधा मक़सद चारों देशों के बीच डिफ़ेंस प्रोडक्शन को बढ़ावा देना, टेक्नॉलजी ट्रांसफ़र करना और आधुनिक डिफ़ेंस ज़रूरतों के मुताबिक़ स्वदेशी डिफ़ेंस इंडस्ट्री को खड़ा करना है.
क़तर के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह समझौता वित्तीय नज़रिए से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चारों देशों की अलग-अलग क्षमताओं को एक साथ लाकर मित्र देशों की रक्षा ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करेगा.
बीबीसी उर्दू के मुताबिक़, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाज़ा आसिफ़ ने एक्स पर लिखा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय और घरेलू क़ानूनों के दायरे में रहते हुए आत्मनिर्भरता, संयुक्त उत्पादन और टेक्नॉलजी ट्रांसफ़र के अवसरों का लाभ उठाने के लिए उत्सुक है.
इस समझौते में शामिल चारों देशों की सामरिक क्षमता को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थाओं के आंकड़ों पर गौर करना ज़रूरी है.
ग्लोबल फ़ायरपावर इंडेक्स के अनुसार, इन चारों देशों में सबसे बड़ी सक्रिय सेना पाकिस्तान के पास है, जिसमें लगभग 6 लाख 60 हज़ार सक्रिय कर्मी हैं.
इसके बाद तुर्की में 4 लाख 81 हज़ार और इंडोनेशिया में 4 लाख से अधिक सक्रिय सैन्यकर्मी हैं.
वहीं चौथे साझेदार क़तर के पास अन्य तीनों देशों की तुलना में काफ़ी कम, 26 हजार 550 सक्रिय सैनिक हैं.
सैन्य बजट और हथियार निर्यात के मामले में स्वीडन स्थित प्रतिष्ठित शोध संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट सिपरी के आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं.
सिपरी के मुताबिक़, 2025 में तुर्की का रक्षा खर्च 30 अरब डॉलर था और वह दुनिया के सबसे बड़े रक्षा बजट वाले देशों में 18वें स्थान पर है.
पिछले पांच वर्षों में अपने रक्षा निर्यात में 122 प्रतिशत की वृद्धि के साथ तुर्की दुनिया का 11वां सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बन गया है, जो उसे इस समूह का मुख्य तकनीकी इंजन बनाता है.
सिपरी के अनुसार, 2025 में पाकिस्तान का रक्षा बजट 11.9 अरब डॉलर रहा और वह दुनिया में 31वें स्थान पर है.
जबकि इंडोनेशिया ने 2025 में रक्षा पर 15 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए, जो 2024 की तुलना में लगभग 26 प्रतिशत अधिक है.
सिपरी पर उपलब्ध 2022 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, क़तर का रक्षा बजट 15.4 अरब डॉलर था, जो पाकिस्तान के कुल रक्षा बजट से भी अधिक है.
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