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गुलामी में भी भारत को विश्व विजेता बनाने वाले मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न कब? - डॉ अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

Updated on 19-02-2026 08:37 AM
कहा जाता है कि 1936 के बर्लिन ओलंपिक के बाद जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर ने भारतीय हॉकी टीम के जादूगर मेजर ध्यानचंद को अपने देश में उच्च पद और सम्मानजनक जीवन का प्रस्ताव दिया था। ध्यानचंद ने विनम्रता से मना कर दिया। उस दौर में, जब भारत गुलाम था, यह फैसला केवल एक खिलाड़ी का नहीं था यह एक राष्ट्र के स्वाभिमान का ऐलान था। लेकिन विडंबना देखिए, जिस खिलाड़ी की प्रतिभा के आगे हिटलर जैसा तानाशाह भी नतमस्तक हो गया, उसी खिलाड़ी को आज़ाद भारत अब तक अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान नहीं दे सका है।
भारतीय खेल इतिहास में मेजर ध्यानचंद का नाम किसी पदक या रिकॉर्ड से कहीं बड़ा है। वह सिर्फ हॉकी के महान खिलाड़ी नहीं थे, वह उस दौर में भारत की आत्मा थे, जब जीत सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की होती थी। तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक, दुनिया भर में भारत का परचम और हर मैदान पर विरोधियों के बीच भारत का डर, यह सब किसी आधुनिक स्पोर्ट्स सिस्टम या करोड़ों की सुविधाओं के बिना संभव हुआ था। लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है कि आखिर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न कब मिलेगा?
आज हम अमृत काल की बात करते हैं, आत्मनिर्भर भारत का गर्व से उल्लेख करते हैं और विश्वगुरु बनने के सपने देखते हैं। लेकिन क्या किसी राष्ट्र की महानता केवल भविष्य के दावों से तय होती है, या फिर इस बात से कि वह अपने अतीत के नायकों के साथ कितना न्याय करता है? ध्यानचंद का मामला अब सिर्फ एक सम्मान का नहीं रह गया है, यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र की कसौटी बन चुका है।
1936 का बर्लिन ओलंपिक कोई सामान्य टूर्नामेंट नहीं था। यह एक तरफ नाजी जर्मनी की सत्ता और शक्ति का प्रदर्शन था तो दूसरी तरफ एक गुलाम भारत की टीम, जिसके पास न संसाधन थे, न राजनीतिक ताकत का प्रतीक था। फिर भी, जब ध्यानचंद की स्टिक चली, तो वह केवल गेंद नहीं थी जो गोलपोस्ट में जा रही थी, वह भारत का आत्मविश्वास था, जो दुनिया को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था। उस जीत ने यह साबित कर दिया कि गुलामी राजनीतिक हो सकती है, प्रतिभा और आत्मसम्मान कभी गुलाम नहीं होते।
फिर भी आज, दशकों बाद, हमें यह सवाल पूछना पड़ रहा है कि क्या हमारे सम्मान का पैमाना बदल गया है? क्या सम्मान अब लोकप्रियता, टीवी रेटिंग और बाजार मूल्य से तय होगा? सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न मिलना पूरी तरह उचित था क्योंकि उन्होंने देश को गौरव दिलाया। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उनसे पहले के नायकों का महत्व कम हो जाता है? क्या हॉकी, जिसने भारत को विश्व में पहली पहचान दिलाई, आज भी उतनी ही अहम मानी जाती है? समझने वाले बात यह भी है कि मेजर ध्यानचंद के नाम पर स्टेडियम है, डाक टिकट हैं, मूर्तियाँ हैं, उनका जन्मदिन राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है यानी हर औपचारिक सम्मान मौजूद है। बस अगर कुछ नहीं है, तो वह है देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान। यह वर्तमान राजनीतिक भाषा में सरकारों द्वारा दिए जाने वाले किसी लॉलीपॉप से अधिक नहीं है।
भारत रत्न किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे युग को सम्मान देता है। अगर ध्यानचंद को यह सम्मान मिलता है, तो वह उस भारत को सम्मान होगा जो गुलामी में भी विजेता था। यह संदेश होगा कि भारत अपने इतिहास को नहीं भूलता और अपने असली नायकों के साथ देर से सही, लेकिन न्याय जरूर करता है। यह खेलों में समान सम्मान का भी प्रतीक बनेगा। यह बताएगा कि भारत के लिए हर वह खिलाड़ी महत्वपूर्ण है जिसने तिरंगे को ऊँचा किया चाहे वह कैमरों की चकाचौंध में रहा हो या इतिहास की किताबों में। साथ ही, यह नैतिक मूल्यों की वापसी का भी संकेत होगा, जहाँ सादगी, अनुशासन, मेहनत और देशभक्ति को फिर से महानता का पैमाना माना जाएगा।

आज भारत अंतरिक्ष में चंद्रयान उतार चुका है, दुनिया में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। अब समय है कि हम यह भी दिखाएँ कि हम अपने नायकों के प्रति संवेदनशील और न्यायपूर्ण हैं। भारत सरकार से मुझे व्यक्तिगत उम्मीद भी है क्योंकि विगत सालों में जिस प्रकार पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक, देश के महान नायकों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज़ा गया है, उसी कड़ी में मेजर ध्यानचंद को भी शामिल किया जाएगा। मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देना कोई एहसान नहीं होगा, यह ऐतिहासिक भूल को सुधारने का एक साहसिक कदम होगा, जिसके लिए सत्ता पक्ष को पहचाना भी जाता है। जिस दिन मेजर ध्यानचंद का नाम भारत रत्न की सूची में शामिल होगा, उस दिन ही वह सूची पूरी होगी। और तब हम गर्व से कह सकेंगे कि भारत अपने नायकों को भूलता नहीं, बस कभी-कभी उन्हें याद करने में ज़रा देर कर देता है।

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