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राजनांदगांव में पद्मश्री फुलबासन ने जमीन के नीचे से ढूंढ निकाले चार करोड़, 427 गांवों की 9936 महिलाओं की जिमीकंद ने बदली तकदीर

Updated on 29-06-2026 02:07 PM
गांवों में सामान्य रूप से सब्जी में खाए जाने वाले जिमीकंद को स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने ऐसा बाजार दिया कि अब उसकी धमक बड़ी-बड़ी पार्टियों तक है। वर्ष 2014 से पहले शादी, जन्मदिन, गृह प्रवेश की पार्टी हो या अन्य किसी भी बड़े कार्यक्रमों में जिमीकंद की सब्जी शामिल नहीं होती थी, लेकिन अब यह लगभग हर कार्यक्रम का जरूरी हिस्सा बन चुका है।
पद्मश्री फुलबासन यादव के संयोजन वाली मां बम्लेश्वरी फेडरेशन से जुड़े हरियाली बहिनी अभियान के माध्यम से इसकी ब्रांडिंग की गई। फिर 2025 में 32 गांवों में सरकारी जमीन पर 1000 देसी जिमीकंद लगाने का लक्ष्य पर काम शुरू किया गया। वर्तमान में जिमीकंद बेचकर समूहों को हर साल लगभग चार करोड़ रुपये की आय हो रही है। 2027 तक लक्ष्य है कि हर गांव को हर दो साल में 60 हजार रुपये की आय हो।
427 गांवों तक पहुंचा अभियान
वर्ष 2014 से 2019 के मध्य 427 गांवों में यह अभियान पहुंचा। इस दौरान 1545 स्व-सहायता समूह जुड़े। 9936 महिलाओं की भागीदारी रही। जिमीकंद के कुल 32 लाख 55 हजार 516 बीज लगाए गए। अभियान प्रमुख शिव कुमार देवांगन के अनुसार यह अभियान केवल खेती नहीं, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता, महिला सशक्तीकरण और सामुदायिक विकास का एक सफल माडल बन गया है। जिमीकंद जैसी पारंपरिक फसल को अपनाकर ग्रामीण आज अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं और गांव के विकास में योगदान भी दे रहे हैं।
पदयात्राएं, बड़ी सभाएं और पुरस्कार योजनाएं भी चलाई
वर्ष 2014 में “जिमीकंद लगाओ-हजारों रुपये कमाओ” अभियान की शुरुआत की गई। पहले ग्रामीण लोग जिमीकंद केवल अपने खाने और रिश्तेदारों को देने के लिए उगाते थे। वे जमीन से बड़ा कंद निकालने के बाद बचे हुए बीज को वहीं छोड़ देते थे, जो दो वर्ष में फिर तैयार हो जाता था। लेकिन इसे कभी व्यवसाय के रूप में नहीं देखा गया। इस सोच को बदलने का कार्य मां बम्लेश्वरी की प्रेरणा से शुरू हुआ। लोगों को परती भूमि, खेत की मेड़ों और बाड़ी में जिमीकंद लगाने के लिए लगातार जागरूक किया गया। इसके लिए पदयात्राएं, बड़ी सभाएं और पुरस्कार योजनाएं चलाई गईं। अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले कार्यकर्ताओं और संगठनों को एक लाख रुपये तक के पुरस्कार दिए गए।


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