डिजिटल इंडिया में नेटवर्क को तरस रहा छत्तीसगढ़ का दबेना गांव, पेड़ और पोल पर चढ़कर बात करते हैं लोग
Updated on
28-06-2026 08:04 PM
डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन सेवाओं के दौर में जिले का दबेना गांव आज भी मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। नरहरपुर विकासखंड के एक हजार से अधिक आबादी वाले इस गांव में हालात ऐसे हैं कि मोबाइल पर बात करने के लिए ग्रामीणों को मकानों की छतों, पेड़ों और हाईमास्ट लाइट के पोल का सहारा लेना पड़ता है।
दबेना गांव राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यह गांव चार बार सांसद रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय अरविंद नेताम और पूर्व वन मंत्री शिव नेताम का गांव रहा है। देश-प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले जनप्रतिनिधि देने वाला यह गांव आज भी नेटवर्क के लिए संघर्ष कर रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से मोबाइल टावर की मांग की जा रही है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं मिला।
जियो का टावर लगा पर हो गया बंद, बीएसएनएल की सिर्फ चर्चा
गांव में कुछ वर्ष पहले जियो कंपनी का मोबाइल टावर स्थापित किया गया था, जिससे उम्मीद जगी थी। लेकिन तकनीकी कारणों से टावर कुछ महीनों तक ही चला और बाद में बंद कर हटा दिया गया। बीएसएनएल टावर लगाने की चर्चा भी हुई, पर आज तक कोई नया टावर स्थापित नहीं हो पाया। वर्तमान में गांव में किसी भी कंपनी का टावर नहीं है।
ऑनलाइन कार्य ठप, लैम्प्स की छत पर डोंगल के सहारे काम
दबेना की लैम्प्स सहकारी समिति पर आसपास के नौ गांवों के किसान निर्भर हैं। नेटवर्क नहीं होने से धान भुगतान, पंजीयन, आधार सत्यापन और अन्य ऑनलाइन कार्य बुरी तरह प्रभावित हैं। स्थिति यह है कि लैम्प्स कार्यालय की छत पर ऊंचा पोल लगाकर डोंगल टांगा गया है, फिर भी पूरे दिन में मुश्किल से तीन-चार किसानों का ही काम हो पाता है।
कंप्यूटर ऑपरेटर रोहित मरकाम ने बताया, इंटरनेट सिग्नल नहीं मिलने से किसानों के पंजीयन और भुगतान लंबित हो जाते हैं। ग्रामीणों को कई दिनों तक चक्कर लगाना पड़ता है।
हाईमास्ट पोल पर लटकाना पड़ता है डोंगल
ग्राहक सेवा केंद्र में भी गंभीर समस्या है। संचालक नेटवर्क पाने के लिए डोंगल को थैले में रखकर रस्सी के सहारे हाईमास्ट लाइट के ऊंचे पोल पर लटकाता है। इसके बावजूद दिनभर में सीमित लोगों का ही काम हो पाता है। नेटवर्क नहीं मिलने पर ग्रामीणों को 10 किमी दूर नरहरपुर मुख्यालय जाना पड़ता है। किसान कमलेश कुमार मरकाम सात किमी दूर से आए थे, लेकिन नेटवर्क नहीं होने से बिना काम लौटना पड़ा।
छात्र, किसान, बुजुर्ग सभी परेशान; एम्बुलेंस बुलाने के लिए भी दूसरे गांव जाना मजबूरी
नेटवर्क की कमी का सबसे ज्यादा असर किसानों, विद्यार्थियों और बुजुर्ग पेंशनधारियों पर पड़ रहा है। बैंकिंग कियोस्क सेंटर इंटरनेट नहीं होने से अक्सर बंद रहता है। राशन की पॉश मशीन भी काम नहीं करती, जिससे हितग्राहियों को दूसरे गांव जाना पड़ता है।
गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य एवं आयुष केंद्र है, लेकिन मरीज की तबीयत बिगड़ने या दुर्घटना पर एम्बुलेंस बुलाने के लिए भी ग्रामीणों को दूसरे गांव जाकर फोन करना पड़ता है। हाई स्कूल, पटवारी कार्यालय, वन विभाग और कृषि विभाग के ऑनलाइन कार्य भी लगातार बाधित होते हैं।
प्रशासन से शिकायत, पर अब तक नहीं हुआ समाधान
ग्रामीणों का कहना है कि इस संबंध में कई बार प्रशासन और विभागों को अवगत कराया जा चुका है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। ग्रामीणों ने शीघ्र मोबाइल टावर लगाने या आसपास के टावरों की कनेक्टिविटी बढ़ाने की मांग की है, ताकि दबेना सहित आसपास के गांवों को राहत मिल सके।
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