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इसराइल चुनाव: नेतन्याहू का गठबंधन आगे पर बहुमत से दूर, अब तक आए नतीजों से क्या संकेत मिल रहे हैं?

Updated on 29-10-2026 06:25 PM

इसराइल के आम चुनाव के आंशिक नतीजों से पता चलता है कि प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू अपने प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़नकोट से आगे चल रहे हैं, लेकिन संसद में बहुमत हासिल करने से अभी भी दूर हैं.

85% मतों की गिनती के बाद, नेतन्याहू और उनके सहयोगी 120 सीटों वाली संसद में 53 सीटें जीतने की राह पर थे. आइज़नकोट की याशर पार्टी और उनके गुट की तीन अन्य यहूदी विपक्षी पार्टियां 48 सीटें जीतने की ओर बढ़ रही थीं.


दोनों नेताओं ने कहा है कि वे गठबंधन सरकार बनाने की कोशिश करेंगे.

अरब नेतृत्व वाली पार्टियां 19 सीटों पर जीत हासिल कर सकती हैं. अब ये पार्टियां किंगमेकर के रूप में उभर सकती हैं. लेकिन यहूदी पार्टियों में से एक को छोड़कर बाकी सभी ने उनके साथ काम न करने का निर्णय लिया है.

सैनिकों, राजनयिकों और अस्पतालों में भर्ती मरीजों समेत विभिन्न समूहों के चार लाख 30 हज़ार से चार लाख 80 हज़ार डाक मतपत्रों की गिनती अभी बाकी है, इसलिए अंतिम चुनाव नतीजे आने में एक या दो दिन और लग सकते हैं.

एक बार इनकी पुष्टि हो जाने के बाद, राष्ट्रपति हर्ज़ोग सभी राजनीतिक दलों के साथ बातचीत करेंगे और उसके बाद ही वो किसी नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे. इस प्रक्रिया में कई हफ़्ते लग सकते हैं.

अगर वे असफल होते हैं, तो दोबारा चुनाव करवाने पड़ेंगे.

यरुशलम स्थित अपने आवास पर हुई एक बैठक के दौरान हर्ज़ोग ने मंगलवार को हुए चुनाव में 77.7% वोटिंग की सराहना की, जो दो दशकों से अधिक समय में देश का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत था.

उन्होंने कहा, "यह इसराइली समाज के लिए गर्व की बात है, और यह देखना उल्लेखनीय था कि इसराइल में लोकतंत्र की इच्छा कितनी गहरी है."

उन्होंने आगे कहा कि उन्हें अगले हफ़्ते आधिकारिक परिणाम मिलने की उम्मीद है, जिसके बाद वह सभी दलों के साथ चर्चा शुरू करेंगे.

उन्होंने कहा, "निश्चित रूप से चुनाव के एक और दौर से बचने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए. इसलिए, मैं उम्मीद करता हूं कि यहां आने वाले सभी लोग खुले दिमाग से आएंगे."

प्रधानमंत्री नेतन्याहू और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी ने इस बात पर जोर दिया है कि उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाया जाना चाहिए.

विपक्षी गठबंधन के लीडर आइज़नकोट ने शुरुआती एग्जिट पोल के आधार पर दावा किया कि जनता ने "बदलाव के पक्ष में फैसला सुनाया है."

इसराइल के तीन प्रसारकों के एग्जिट पोल में अनुमान लगाया गया था कि आइज़नकोट का "चेंज ब्लॉक" इसराइली संसद की 52 से 53 सीटें हासिल करेगा, जबकि नेतन्याहू के गठबंधन को 50 सीटें मिलने का अनुमान था.

तेल अवीव में याशर पार्टी के चुनाव मुख्यालय में समर्थकों से बात करते हुए उन्होंने कहा, "विफल गठबंधन ने जनता का विश्वास खो दिया है. मैं अपने सहयोगियों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करूंगा कि जनता का निर्णय ज़ायोनिस्ट सरकार में तब्दील हो."

बाद में, प्रसारकों ने अपने एग्जिट पोल को अपडेट किया, जिनमें से दो ने अनुमान लगाया कि दोनों गुट 51 सीटों पर बराबरी पर रहेंगे और एक ने नेतन्याहू के गुट को तीन सीटों की मामूली बढ़त दी.

उन्होंने कहा, "हमें एक मजबूत दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सरकार बनानी होगी. ज़ायोनी-विरोधी अरब दलों पर निर्भर सरकार बनाकर इसराइल को खतरे में डालना सरासर मना है."

बुधवार को मतगणना के दौरान यह सामने आया कि उनके गुट ने एग्जिट पोल के अनुमानों से बेहतर प्रदर्शन किया है और 53 सीटें जीतने की राह पर है. हालांकि, यह आंकड़ा पिछली संसद में उनके द्वारा जीती गई सीटों से 15 कम है.

मंगलवार को हुआ चुनाव 7 अक्तूबर 2023 को हमास के घातक हमलों और उसके बाद ग़ज़ा, लेबनान और ईरान में हुए युद्धों के बाद पहला चुनाव था.

इसराइल के लोगों ने भी इसे देश के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण चुनावों में से एक माना क्योंकि यह न केवल उनके नेतृत्व का फैसला कर सकता था, बल्कि यह भी तय कर सकता था कि देश अपने वर्तमान कठोर, धार्मिक-राष्ट्रवादी दिशा में चलता रहेगा या नहीं.

उन्होंने कहा, "मुझे नए नेतृत्व की उम्मीद थी. मुझे लगता है कि एक राष्ट्र के रूप में हमें इसकी ज़रूरत है. 7 अक्तूबर को जो लोग सत्ता में थे, उन्हें अब सत्ता में नहीं होना चाहिए."

उन्होंने कहा कि लोग इस बात से निराश हैं कि नेतन्याहू ने तीन साल पहले हुई घटना की ज़िम्मेदारी नहीं ली, जिसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए थे और 251 अन्य को बंधक बना लिया गया था. उनके पति की दादी भी किबुत्ज़ बे'एरी में मरने वालों में शामिल थीं.

रमात गान के रहने वाले गैल ने कहा कि उन्होंने नेतन्याहू को वोट दिया क्योंकि इसराइली ऐसे पड़ोसियों के साथ शांति से नहीं रह सकते जिनका एकमात्र मकसद यहूदियों को मिटाना हो.

उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें "अरब राजनीतिक दलों के मजबूत होने का डर है".

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